30/10/2025
लेखनीकेँ धार - भाई-बहिनक स्नेहक प्रतीक: विलुप्त होइत सामा-चकेवा
मिथिला अपन विशिष्ट लोक संस्कृति आ अनुपम पर्व-तिहारक लेल विश्व-विख्यात अछि। एतय सालक बारहो मास कोनो ने कोनो उत्सव होइते रहैत अछि, मुदा भाई-बहिनक पवित्र आ अटूट सम्बन्धक प्रतीक सामा-चकेवा केँ लोक-पर्व सभमे एकटा महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त छैक। ई पर्व ने सिर्फ मानवीय स्नेहक उच्चतम आदर्शक प्रदर्शन करैत अछि, बल्कि मिथिलाक पर्यावरण प्रेम आ लोक-कलाक सेहो सजीव चित्रण प्रस्तुत करैत अछि।
पर्वक काल आ स्वरूप -
ई पाबनि हिन्दू पंचांगक अनुसार, कार्तिक मासक शुक्ल पक्षक सप्तमी तिथि सँ आरम्भ भ' कए पूर्णिमा धरि, प्रायः सातसँ दस दिन धरि, हर्षोल्लासक संग मनाओल जाइत अछि। छठि महापर्वक समाप्ति होइते एहि पर्वक आरम्भ भ' जाइत अछि। एहि पावनिमे नव-विवाहित आ अविवाहित युवतीसभ अपन भाइकेँ दीर्घायु, सुख-समृद्धि आ मंगलक कामना करैत छथि।
सामा-चकेवाक उत्सव मूलतः माटिक मूर्ति निर्माण आ लोकगीतक गायनसँ जुड़ल अछि। बहिन सभ एहि दिन माटिसँ सामा (भगवान कृष्णक पुत्री श्यामा), चकेवा (सामक पति चारुदत्त), वृन्दावन (जंगल), चुगला (चुगलखोर), सतभैया (सात भाई), पेटी-पेटार आदिक सुन्दर मूर्ति बनाबैत छथि। मूर्ति सभकेँ सुसज्जित क'कय ओकरा एकटा बाँसक डाला (टोकरी) मे सजाओल जाइत छैक।
सामा खेलबाक विधान -
प्रतिदिन साँझकेँ बहिनसभ समूहमे डाला उठा कए गामक कोनो निश्चित स्थान (सामान्यतः आँगन या गाछीक नीचाँ) पर एकट्ठा होइत छथि। ओतय ओ सामा-चकेवाक मूर्तिकेँ सामूहिक रूपसँ रखि कए चारू दिस घेरा बनाबैत छथि आ विशिष्ट मैथिली लोकगीत गबैत छथि। ई गीत सभ सामा-चकेवाक पौराणिक कथा, भाईक महिमा आ चुगलाक निन्दा पर आधारित होइत छथि। गीतक संगहि मूर्तिकेँ नचाओल जाइत अछि, चुगलाक मुँह झड़िओल जाइत अछि आ फेर ओकरा आगि लगाओल जाइत अछि। ई दृश्य चुगलखोरी आ समाजक नकारात्मक शक्ति पर स्नेह आ सद्भावक विजयकेँ दर्शाबैत अछि।
गीत सभक किछु प्रसिद्ध पंक्ति एहि प्रकारक अछि:
गाम के अधिकारी तोहे फलां भइया हे
भइया के हाथ दस पोखरि बना दैह
चम्पा फूल लगा दैह हे
भइया लोढ़ल भाउजो हार गांथू हे
आहे सेहो हार पहिरथु फलां बहिनो
पौराणिक कथा -
सामा-चकेवाक पाछु एकटा मर्मस्पर्शी पौराणिक कथा छैक जे स्कन्द पुराण आ पद्म पुराणमे वर्णित अछि। कथाक अनुसार, भगवान श्रीकृष्णक पुत्री श्यामा (सामा) आ हुनकर पति चारुदत्त (चकेवा) केँ एकटा **चुगलखोर मंत्री 'चुरक' (चुगला)**क मिथ्या आरोपक कारण श्रीकृष्णक क्रोधक शिकार होमए पड़लनि। क्रोधमे आबि कए श्रीकृष्ण दुनू केँ चिड़ई (मैना) बनि जेबाक श्राप दए देलखिन।
सामाक भाय साम्बकेँ जखन एहि बातक जानकारी भेटलनि तँ ओ अपन बहिन आ जीजाकेँ श्राप मुक्त करबाक लेल घोर तपस्या केलनि आ अंतमे श्रीकृष्णकेँ प्रसन्न कए दुनूकेँ मनुष्य रूपमे वापस अनलनि। साम्बक ई त्याग आ निस्वार्थ प्रेम भाई-बहिनक सम्बन्धक उच्चतम आदर्श स्थापित केलक। ओहि दिनसँ सामा-चकेवा भाई-बहिनक अटल प्रेम आ बलिदानक प्रतीकक रूपमे मिथिलामे मनाओल जाइत अछि।
पर्वक समापन -
कार्तिक पूर्णिमाक राति पर्वक समापन (विसर्जन) होइत अछि। बहिन सभ डालाकेँ अपन भायसँ 'छीन' करबैत छथि आ डाला सहित मूर्तिकेँ ल'कए कोनो नदी, पोखरि वा खेत दिस जाइत छथि। ओतय ओ विदाई गीत गबैत, आँखिमे आँचरसँ जल भरि कए सामाक विदाई करैत छथि। मूर्तिकेँ विसर्जित कएलाक बाद, बहिन सभ नव धानक चूड़ा आ गुड़ भाइकें दैत छथि, जे दीर्घायु आ सुखक प्रतीक मानल जाइत अछि।
विलुप्तिक कारण -
आइ ई अनुपम लोकपर्व मिथिलासँ धीरे-धीरे विलुप्त भेल जा रहल अछि, जकर पाछाँ अनेक कारण अछि:
१. आधुनिकीकरणक प्रभाव: पाश्चात्य संस्कृति आ आधुनिकताक चमकमे लोक अपन लोक-परम्परासँ दूर भ' रहल छथि।
२. प्रवास आ शहरीकरण: शिक्षा आ रोजगारक लेल लोक गाम छोड़ि शहर दिस पलायन क' रहल छथि। शहरक सीमित वातावरणमे ई सामूहिक पर्व मनायब कठिन भ' गेल अछि।
३. समयक अभाव: व्यस्त जीवनशैलीमे लोकक पास एहि आठ दिनक पर्वक लेल पर्याप्त समय नहि रहैत अछि।
४. माटिक खेल सँ दूरी: आइ-काल्हि बच्चा सभ माटिक खेल सँ बेसी मोबाइल आ इलेक्ट्रोनिक खेल दिस आकर्षित भ' रहला छथि। माटिक मूर्ति बनयबाक कला आ उत्साह कम भ' रहल अछि।
५. संरक्षणक कमी: एहि पर्वक संरक्षण आ प्रचार-प्रसारक लेल सरकारी आ सामाजिक स्तर पर उचित प्रयासक कमी देखल जा रहल अछि।
निष्कर्ष
सामा-चकेवा मात्र एकटा पर्व नहि, बल्कि मिथिलाक सांस्कृतिक आत्मा, भाई-बहिनक प्रेम आ लोक-आस्थाक अटूट डोर थिक। एकर विलुप्तिक अर्थ अछि मिथिलाक एकटा गौरवशाली अध्यायक समाप्त भ' गेनाइ। अतः, ई हमरा सभक कर्त्तव्य अछि जे अपन एहि अनमोल धरोहर केँ बचाबी। ई पर्व पुनः घर-घरमे हर्षोल्लासक संग मनाओल जाय, तकरा लेल युवा पीढ़ी केँ आगाँ आबय पड़त। सामा-चकेवाकेँ बचायब, मिथिलाक संस्कृति केँ बचायब थिक! ई पर्व मिथिलाक नारी शक्ति द्वारा अपन भायक मंगलकामनाक लेल कयल गेल त्याग आ अपन संस्कृति केँ सहेजबाक दृढ संकल्पक अनुपम उदाहरण अछि।