Shri Ekdashrudra Devta Musalwadi.

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*_भाग २: चित्त की साधना - सहजयोगी का कर्तव्य_*_*सूक्ष्म प्रणाली पर चतुर्थ दिवस का प्रभाव*_ जैसा कि हमने पहले भाग में समझ...
25/09/2025

*_भाग २: चित्त की साधना - सहजयोगी का कर्तव्य_*

_*सूक्ष्म प्रणाली पर चतुर्थ दिवस का प्रभाव*_

जैसा कि हमने पहले भाग में समझा, आज का दिन श्री कूष्माण्डा की सृजनात्मक ऊर्जा और स्वाधिष्ठान चक्र से जुड़ा है। अब हम यह जानेंगे कि एक सहजयोगी के रूप में, हमें इस ऊर्जा का लाभ उठाने के लिए सूक्ष्म स्तर पर क्या प्रयास करने चाहिए।

आज का दिन हमारे *चित्त (Attention)* को साधने का दिन है। स्वाधिष्ठान चक्र और हमारा चित्त एक दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। जहाँ भी हमारा चित्त जाता है, हमारी ऊर्जा वहीं बहती है। यदि हमारा चित्त लगातार भविष्य की योजनाओं, चिंताओं और विश्लेषण में लगा रहता है, तो हमारी सारी ऊर्जा स्वाधिष्ठान चक्र और दाहिनी नाड़ी *(पिंगला नाड़ी)* को गर्म करने में खर्च हो जाती है।

*_सूक्ष्म प्रभाव:_*
* *_स्वाधिष्ठान चक्र और लीवर:_* आज की ऊर्जा सीधे हमारे स्वाधिष्ठान चक्र और उससे संबंधित अंग, विशेष रूप से लीवर, पर काम करती है। लीवर हमारे शरीर का "हीट अब्जॉर्बर" है। जब हम बहुत अधिक सोचते हैं, तो यह सारी गर्मी लीवर में जमा हो जाती है। आज का ध्यान और सहज उपचार इस संचित गर्मी को बाहर निकालने में मदद करता है।
* *_पिंगला नाड़ी (दाहिनी नाड़ी):_* यह नाड़ी भविष्य, क्रिया और अहंकार से जुड़ी है। आज के दिन की साधना इस नाड़ी को शांत करने और इसे संतुलन में लाने में मदद करती है, जिससे हम वर्तमान क्षण (मध्य मार्ग) में आ पाते हैं।
* *_अहंकार और प्रति-अहंकार (Ego and Superego):_* जब पिंगला नाड़ी अत्यधिक सक्रिय होती है, तो हमारे सिर के बाईं ओर एक गुब्बारे जैसी संरचना बन जाती है, जिसे हम 'अहंकार' कहते हैं। यह सहस्रार से हमारे संबंध को बाधित करता है। आज की साधना इस अहंकार को शांत करने और विसर्जित करने में मदद करती है।

*श्री माताजी ने चित्त को साधने का सरल तरीका बताया:*
*"आपका चित्त एक बच्चे की तरह है। यह हर जगह दौड़ता है। आपको इसे डांटना नहीं है। बस प्यार से उसे अंदर लाना है। जब भी कोई विचार आए, तो उसे देखो और कहो, 'मुझे क्षमा करें'। विचारों के बीच में जो अंतराल है, जो मौन है, वही ध्यान है। धीरे-धीरे, यह अंतराल बढ़ने लगेगा और आप विचारशून्य समाधि में चले जाएंगे।"*

*_आज के दिन सहजयोगियों का क्या कर्तव्य है?_*

आज एक सहजयोगी के रूप में हमें अपनी दिनचर्या में कुछ विशेष क्रियाओं को शामिल करना चाहिए ताकि हम श्री कूष्माण्डा की कृपा को पूर्ण रूप से ग्रहण कर सकें।

*1. _श्री ब्रह्मदेव-सरस्वती का आवाहन:_*
दिन की शुरुआत श्री गणेश की स्तुति के बाद, स्वाधिष्ठान चक्र के देवताओं, श्री ब्रह्मदेव और श्री सरस्वती, के आवाहन से करें। हम उनके मंत्र का जाप कर सकते हैं:
*_"ॐ त्वमेव साक्षात् श्री ब्रह्मदेव-सरस्वती साक्षात् श्री आदिशक्ति माताजी श्री निर्मला देव्यै नमो नमः"_*
उनसे प्रार्थना करें, "हे श्री ब्रह्मदेव और श्री सरस्वती, कृपा करके हमारे भीतर सच्ची रचनात्मकता और निर्मल विद्या को जागृत करें। हमारे विचारों में संतुलन लाएं और हमारे अहंकार को नष्ट करें।"

*2. _श्री कूष्माण्डा की स्तुति:_*
इसके बाद, माँ कूष्माण्डा का ध्यान करें और उनके मंत्र का जाप करें:
*_"ॐ त्वमेव साक्षात् श्री कूष्माण्डा साक्षात् श्री आदिशक्ति माताजी श्री निर्मला देव्यै नमो नमः"_*
यह मंत्र ब्रह्मांडीय रचनात्मक ऊर्जा को हमारे भीतर आकर्षित करता है।

*3. _दाहिने पक्ष को ठंडा करने की क्रियाएं (Cooling the Right Side):_*
आज का सबसे महत्वपूर्ण कार्य अपने दाहिने पक्ष और लीवर को ठंडा करना है।
* *_फुटसोकिंग (Foot Soaking):_* यह अनिवार्य है। आज फुटसोक करते समय, अपना पूरा ध्यान अपने दाहिने हाथ की हथेली पर और लीवर (पेट के दाहिनी ओर) पर रखें। माँ से प्रार्थना करें कि वह आपके लीवर और स्वाधिष्ठान की सारी गर्मी को सोख लें।
* *_बर्फ का प्रयोग (Ice Pack):_* अपने लीवर और दाहिने स्वाधिष्ठान (पेट के दाहिनी ओर, कूल्हे की हड्डी के पास) पर दिन में 5-10 मिनट के लिए बर्फ का पैक (Ice Pack) रखना अत्यंत लाभकारी है। यह दाहिने पक्ष की गर्मी को शांत करने का सबसे प्रभावी तरीका है। *श्री माताजी ने इस क्रिया की सलाह विशेष रूप से उन लोगों को दी जो बहुत अधिक सोचते हैं या जिन्हें लीवर से संबंधित समस्याएं हैं।*
* *_बायां हाथ आकाश की ओर:_* ध्यान में बैठते समय या दिन में कभी भी, अपना बायां हाथ आकाश की ओर उठाएं और सीधा हाथ पृथ्वी पर रखें। यह इड़ा नाड़ी (चंद्र नाड़ी) की ठंडी ऊर्जा को खींचता है और पिंगला नाड़ी (सूर्य नाड़ी) की अतिरिक्त गर्मी को पृथ्वी में विसर्जित करता है।

*4. _कला और संगीत का सात्विक आनंद:_*
आज शास्त्रीय संगीत या भजन सुनें। श्री माताजी द्वारा गाए गए भजन सुनना विशेष रूप से लाभकारी है, क्योंकि उनमें चैतन्य की उच्चतम अभिव्यक्ति होती है। यदि आप कोई कला जानते हैं, तो उसे अहंकार से नहीं, बल्कि माँ को समर्पित करके करें।

*_ध्यान और धारणा: चतुर्थ दिवस की साधना_*

आज की ध्यान प्रक्रिया में हमें अपना चित्त स्वाधिष्ठान चक्र और लीवर पर केंद्रित करना है।

*_ध्यान की विधि:_*
* सहजयोग विधि के अनुसार बंधन लें और कुंडलिनी को सहस्रार पर स्थापित करें।
* श्री गणेश और श्री ब्रह्मदेव-सरस्वती का आवाहन करें।
* अपना सीधा हाथ *(Right Hand)* अपने लीवर पर *(पेट के दाहिनी ओर, पसलियों के नीचे)* रखें। अपना पूरा ध्यान वहीं केंद्रित करें।
* श्री माताजी से प्रार्थना करें: *"श्री माताजी, कृपा करके मेरे लीवर और स्वाधिष्ठान चक्र की सारी अतिरिक्त गर्मी को शांत कर दें। मेरे भविष्य के बारे में सोचने की आदत, मेरे अहंकार और मेरे क्रोध को कृपा करके नष्ट कर दें।"*
* अब अपना सीधा हाथ जमीन पर रखें और बायां हाथ आकाश की ओर उठाएं। कुछ देर इसी स्थिति में रहें और अनुभव करें कि आपके दाहिने पक्ष से गर्मी निकल रही है और बाएं पक्ष से ठंडी ऊर्जा प्रवेश कर रही है।
* अब दोनों हाथ गोद में रखकर श्री माताजी की ओर खोलें। आँखें बंद करके विचारशून्य अवस्था में जाने का प्रयास करें।
* अपना चित्त अपने स्वाधिष्ठान चक्र (रीढ़ की हड्डी में नाभि से थोड़ा नीचे) पर लाएं और श्री कूष्माण्डा के स्वरूप का ध्यान करें।
* ध्यान के अंत में, फिर से बंधन लें, कुंडलिनी को बांधें और माँ को हृदय से धन्यवाद दें।

*श्री माताजी का आश्वासन:*
*"आपको चिंता करने की कोई बात नहीं है। यदि आपने बहुत सोचा है और अपने चक्रों को खराब कर लिया है, तो भी कोई बात नहीं। सहजयोग में हर चीज का इलाज है। आप बस नियमित रूप से फुटसोक करें, बर्फ का प्रयोग करें और सबसे महत्वपूर्ण, क्षमा करें। अपने आप को क्षमा करें और दूसरों को क्षमा करें। आपका ध्यान गहरा हो जाएगा।"*

*_आत्म-निरीक्षण: मेरा चित्त कहाँ है?_*

आज स्वयं से पूछने का दिन है:
* मेरा चित्त अधिकतर कहाँ रहता है - अतीत में, भविष्य में, या वर्तमान में?

* क्या मैं हर चीज की बहुत अधिक योजना और विश्लेषण करता/करती हूँ?

* क्या मुझे अपनी उपलब्धियों पर अहंकार होता है?

* क्या मुझे छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा या चिड़चिड़ाहट होती है? (यह गर्म लीवर का एक निश्चित संकेत है)

* क्या मैं सहज रूप से निर्णय ले पाता/पाती हूँ या हमेशा भ्रमित रहता/रहती हूँ?

इन प्रश्नों के उत्तर हमें हमारे स्वाधिष्ठान की स्थिति का आईना दिखाएंगे। हमें इन कमियों को स्वीकार करना है और उन्हें दूर करने के लिए सहजयोग की सरल तकनीकों का उपयोग करना है।

*_प्रार्थना और समर्पण_*

आइए, हम सब मिलकर इस चतुर्थ दिवस के समापन पर ब्रह्मांड की जननी, श्री कूष्माण्डा स्वरूपिणी हमारी माँ श्री माताजी के चरणों में प्रार्थना करें:

*"हे हमारी माँ, श्री कूष्माण्डा!*
*आपने अपने दिव्य हास्य से इस सम्पूर्ण सृष्टि की रचना की है। हे माँ, कृपा करके हमारे जीवन में भी वही दिव्य आनंद और सहजता भर दें।*
*हमारे स्वाधिष्ठान चक्र को शुद्ध और शीतल कर दें। हमारे चित्त को हमारे विचारों के कोलाहल से निकालकर, वर्तमान क्षण के मौन में स्थापित कर दें।*
*हमारे लीवर की सारी गर्मी को शांत कर दें, हमारे अहंकार को अपने श्री चरणों की धूल में विलीन कर दें।*
*हे श्री सरस्वती, हमें निर्मल विद्या का आशीर्वाद दें, ताकि हम सत्य को अपने चैतन्य पर जान सकें।*
*माँ, हमें अपनी रचनात्मकता का माध्यम बनाएं, ताकि हम जो भी करें, वह आपकी महिमा को व्यक्त करे।"*

*_जय श्री माताजी!_*

*जय श्री माताजी!🙏**आज नवरात्रि का चतुर्थ दिवस है।*https://whatsapp.com/channel/0029VbB4EYj7T8bWLtEng22Rमाँ आदिशक्ति की क...
25/09/2025

*जय श्री माताजी!🙏*

*आज नवरात्रि का चतुर्थ दिवस है।*
https://whatsapp.com/channel/0029VbB4EYj7T8bWLtEng22R

माँ आदिशक्ति की कृपा और श्री माताजी निर्मला देवी के असीम प्रेम के सागर में हम अपनी आध्यात्मिक यात्रा के चौथे दिन में प्रवेश कर रहे हैं। प्रथम तीन दिन, हमने अपने मूलाधार, स्वाधिष्ठान और नाभि चक्रों पर काम किया, जो हमारे अस्तित्व के आधार और भौतिक कल्याण से जुड़े हैं। अब हमारी यात्रा ऊपर की ओर, हृदय की ओर अग्रसर हो रही है, लेकिन उस हृदय तक पहुँचने से पहले, हमें उस शक्ति को समझना होगा जो इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड का स्रोत है।

आज का दिन माँ आदिशक्ति के *श्री कूष्माण्डा* स्वरूप को समर्पित है। यह वह स्वरूप है जिससे सृष्टि का आरम्भ हुआ। आज हम श्री माताजी के दिव्य ज्ञान के प्रकाश में इस दिन के गहनतम रहस्यों को समझेंगे, जानेंगे कि श्री कूष्माण्डा देवी का हमारे सूक्ष्म तंत्र में क्या स्थान है, और इस दिन एक सहजयोगी को अपनी साधना में किन बातों पर ध्यान देना चाहिए।

यह लेख, श्री माताजी के उपदेशों पर आधारित, दो भागों में विभाजित है, जो इस दिन के महत्व और साधना की विस्तृत विवेचना करता है।

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*_भाग १: ब्रह्मांड की सृजनकर्ता - श्री कूष्माण्डा और निर्मल विद्या_*

*_*प्रस्तावना: जब अंधकार में हुआ प्रकाश*_ *

कल्पना कीजिए उस समय की, जब कुछ भी नहीं था। न सूर्य, न तारे, न पृथ्वी, न जीवन। चारों ओर केवल घना अंधकार और शून्य व्याप्त था। उस महाशून्य में, जब सृष्टि का कोई अस्तित्व नहीं था, तब माँ आदिशक्ति ने अपने दिव्य हास्य की एक किरण से इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड की रचना की। वह मंद मुस्कान, वह दिव्य हास्य ही श्री कूष्माण्डा देवी का स्वरूप है।

*'कूष्माण्डा'* शब्द का अर्थ बहुत गहरा है। *'कु'* का अर्थ है 'थोड़ा सा', *'उष्मा'* का अर्थ है *'गर्मी'* या *'ऊर्जा'*, और *'अंडा'* का अर्थ है 'ब्रह्मांडीय अंडा' या *'सृष्टि'*। अर्थात, "वह देवी जिन्होंने अपनी थोड़ी सी ऊर्जा (मंद मुस्कान) से इस ब्रह्मांड रूपी अंडे की रचना की।" वह सम्पूर्ण जगत की जननी हैं। सूर्य के तेज में जो ऊर्जा है, वह भी माँ कूष्माण्डा की ही देन है। उनका निवास सूर्यलोक के भीतरी भाग में माना जाता है, जहाँ कोई और निवास नहीं कर सकता।

*श्री माताजी ने आदिशक्ति के इस स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा था:*
*"आदिशक्ति ने ही इस सारी दुनिया को बनाया है। पहले कुछ भी नहीं था, केवल अंधकार था। और फिर उन्होंने सोचा, 'एक खेल होना चाहिए'। और अपने इसी विचार से, अपनी इच्छा से, उन्होंने इस सारे ब्रह्मांड का निर्माण किया। यह कूष्माण्डा का स्वरूप उसी सृजनात्मक शक्ति का प्रतीक है, जो शून्य से सब कुछ बना सकती है।"*

_*श्री कूष्माण्डा का दिव्य स्वरूप और उसका प्रतीकवाद*_

माँ कूष्माण्डा अष्टभुजाधारी हैं, अर्थात उनकी आठ भुजाएं हैं। वह सिंह पर विराजमान हैं, जो धर्म और शौर्य का प्रतीक है।
* *_अष्टभुजाएं:_* उनकी आठ भुजाओं में कमण्डल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृत-पूर्ण कलश, चक्र, गदा और सभी सिद्धियों को देने वाली जपमाला है। यह दर्शाता है कि सृष्टि के सृजन, पालन और संहार की सभी शक्तियाँ उन्हीं में निहित हैं।
* *_अमृत-कलश:_* उनके हाथ में अमृत का कलश हमें यह आश्वासन देता है कि वह न केवल जन्म देती हैं, बल्कि हमें मोक्ष और अमरत्व का आशीर्वाद भी प्रदान करती हैं। सहजयोग में, यह अमृत हमारे सहस्रार से बहने वाला दिव्य चैतन्य है।
* *_सिंह की सवारी:_* उनका सिंह पर विराजमान होना यह दर्शाता है कि इतनी विशाल सृजन शक्ति होने के बावजूद, वह पूर्ण रूप से धर्म पर आरूढ़ हैं। उनकी हर रचना धर्म और संतुलन पर आधारित है।

*श्री माताजी ने देवी के प्रतीकों को समझाया:*
*"देवी के हर हाथ में जो कुछ भी है, उसका एक अर्थ है। यह सब आपके सूक्ष्म तंत्र के भीतर की शक्तियों का प्रतीक है। जब आप सहजयोग में गहरे उतरते हैं, तो आप इन सभी शक्तियों को अपने भीतर जागृत कर सकते हैं। आप सृजन कर सकते हैं, आप संतुलन बना सकते हैं, और आप नकारात्मकता का नाश कर सकते हैं।"*

*_*श्री कूष्माण्डा और स्वाधिष्ठान चक्र का गहन संबंध*_ *

अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि सहजयोग में, हमारे सूक्ष्म तंत्र पर श्री कूष्माण्डा का स्थान कहाँ है?

माँ कूष्माण्डा सृजन की देवी हैं। हमारे सूक्ष्म शरीर में, सृजन, शुद्ध ज्ञान और रचनात्मकता का केंद्र हमारा दूसरा चक्र, *स्वाधिष्ठान चक्र* है। यही वह स्थान है जहाँ सृष्टि के रचयिता *श्री ब्रह्मदेव* और शुद्ध ज्ञान की देवी *श्री सरस्वती* का वास है। इसलिए, नवरात्रि के चौथे दिन की ऊर्जा मुख्य रूप से हमारे स्वाधिष्ठान चक्र को पोषित और शुद्ध करती है।

स्वाधिष्ठान चक्र हमारी रचनात्मकता, सौंदर्य बोध, कलात्मकता और सबसे महत्वपूर्ण, *'निर्मल विद्या'* यानी शुद्ध ज्ञान का केंद्र है। जब यह चक्र संतुलित और जागृत होता है, तो व्यक्ति के अंदर से सहज ही रचनात्मकता बहती है। वह जो कुछ भी करता है, उसमें एक सौंदर्य और दिव्यता होती है। उसे वह ज्ञान प्राप्त होता है जो पुस्तकों में नहीं मिलता, बल्कि सीधे परमात्मा के स्रोत से आता है।

*श्री माताजी ने स्वाधिष्ठान चक्र की शक्ति का वर्णन किया:*
*"स्वाधिष्ठान चक्र बहुत महत्वपूर्ण है। यह श्री ब्रह्मदेव का चक्र है, जिन्होंने इस दुनिया को बनाया। आपकी सारी रचनात्मकता यहीं से आती है। लेकिन जब आप बहुत अधिक सोचना शुरू कर देते हैं, भविष्य की योजनाएँ बनाते हैं, तो यह चक्र गर्म हो जाता है और खराब हो जाता है। तब रचनात्मकता की जगह अहंकार ले लेता है।"*

_*सृजन शक्ति: अहंकार या दिव्यता?*_

स्वाधिष्ठान चक्र की ऊर्जा दोधारी तलवार की तरह है। जब यह शुद्ध होती है, तो यह दिव्य रचनात्मकता को जन्म देती है। एक सहजयोगी जो लिखता है, गाता है, या कोई भी कलाकृति बनाता है, वह वास्तव में स्वयं कुछ नहीं कर रहा होता; वह केवल परमात्मा की शक्ति के लिए एक माध्यम, एक चैनल बन जाता है। ऐसी रचना में चैतन्य होता है और वह दूसरों को भी आनंद और शांति प्रदान करती है।

लेकिन, जब इस चक्र में अहंकार का प्रवेश हो जाता है, तो वही रचनात्मकता विषाक्त हो जाती है। व्यक्ति सोचने लगता है, *"मैंने यह किया," "मैं बहुत रचनात्मक हूँ," "मेरी कला सबसे अच्छी है।"* यह अहंकार और भविष्य के बारे में अत्यधिक सोचना *(planning and thinking)* स्वाधिष्ठान चक्र को अत्यधिक सक्रिय कर देता है, जिससे यह गर्म हो जाता है।

यह अतिरिक्त गर्मी हमारे *दाहिने पक्ष (Right Side or Pingala Nadi)* में चली जाती है, जिससे हमारा लीवर, पैंक्रियास और गुर्दे प्रभावित होते हैं। आज दुनिया में अधिकांश समस्याएं, जैसे मधुमेह *(diabetes)*, उच्च रक्तचाप *(high blood pressure)*, और हृदय रोग, इसी दाहिने पक्ष की अत्यधिक सक्रियता के कारण होती हैं।

*श्री माताजी ने इस खतरे के बारे में बार-बार चेतावनी दी:*
*"सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोग बहुत ज्यादा सोचते हैं। भविष्य, भविष्य, भविष्य! यह सोच-सोच कर आपने अपने लीवर को पूरी तरह से नष्ट कर दिया है। लीवर आपके 'चित्त' (Attention)* का स्थान है। जब लीवर गर्म होता है, तो आपका चित्त स्थिर नहीं रह सकता, आप ध्यान में नहीं जा सकते। आपको अपने विचारों को देखना और उन्हें क्षमा करना सीखना होगा।"*

_*निर्मल विद्या: स्वाधिष्ठान की सच्ची देन*_

जब हम अपने स्वाधिष्ठान को शुद्ध करते हैं, अपने अहंकार को माँ के चरणों में समर्पित करते हैं, और अत्यधिक सोचना बंद कर देते हैं, तब इस चक्र का सच्चा गुण, *'निर्मल विद्या'* (Pure Knowledge), हमारे भीतर प्रकट होता है।

निर्मल विद्या का अर्थ है - वह ज्ञान जो आपको अपनी उंगलियों पर, अपने चैतन्य के माध्यम से महसूस होता है। आपको किसी से पूछने की ज़रूरत नहीं है कि क्या सही है और क्या गलत। आपकी उंगलियों पर बहता हुआ ठंडा या गर्म चैतन्य ही आपको बता देता है। आप जान जाते हैं कि कौन व्यक्ति सही है, कौन सी जगह सही है, कौन सा निर्णय सही है। यह श्री सरस्वती की शक्ति है जो हमारे भीतर जागृत होती है।

*श्री माताजी ने निर्मल विद्या के बारे में समझाया:*
*"आत्म-साक्षात्कार के बाद, आप स्वयं गुरु बन जाते हैं। आपको किसी पुस्तक या किसी व्यक्ति की आवश्यकता नहीं है। आपका चैतन्य ही आपका गुरु है। यह आपको सब कुछ बताता है। यह शुद्ध ज्ञान है, क्योंकि इसमें कोई अहंकार या मानसिक प्रक्षेपण नहीं है। यह सत्य का सीधा अनुभव है।"*

आज, श्री कूष्माण्डा के दिन, हमें इसी निर्मल विद्या को प्राप्त करने की प्रार्थना करनी चाहिए। हमें प्रार्थना करनी चाहिए कि माँ हमारे स्वाधिष्ठान चक्र को ठंडा करें, हमारे अहंकार को नष्ट करें, और हमें अपनी रचनात्मकता को परमात्मा की सेवा में उपयोग करने की बुद्धि और विवेक प्रदान करें।

यह दिन सृजन के स्रोत से जुड़ने का दिन है। यह समझने का दिन है कि हम कर्ता नहीं हैं, हम केवल माध्यम हैं। जब हम इस सत्य को पूरी तरह से स्वीकार कर लेते हैं, तो हमारा जीवन सहज और आनंदमय हो जाता है, ठीक उसी दिव्य हास्य की तरह जिससे माँ कूष्माण्डा ने इस ब्रह्मांड की रचना की थी।
*जय श्री माताजी 🙏*

1*_भाग २: साधना और संतुलन - सहजयोगी का मार्ग_*_*सूक्ष्म प्रणाली पर प्रभाव और नाभि की पकड़*_ जैसा कि हमने पहले भाग में सम...
24/09/2025

1*_भाग २: साधना और संतुलन - सहजयोगी का मार्ग_*

_*सूक्ष्म प्रणाली पर प्रभाव और नाभि की पकड़*_

जैसा कि हमने पहले भाग में समझा, नवरात्रि का तीसरा दिन हमारे नाभि चक्र और उसके आसपास के क्षेत्र, जिसे *भवसागर (Void)* भी कहते हैं, पर गहनता से कार्य करता है। भवसागर वह क्षेत्र है जो स्वाधिष्ठान और नाभि चक्र के बीच स्थित है और यह गुरु के सिद्धांत का स्थान है।

_*सूक्ष्म प्रणाली पर प्रभाव:*_
* *_नाभि चक्र:_* आज के दिन जब हम श्री चंद्रघंटा का ध्यान करते हैं, तो उनकी दिव्य ऊर्जा हमारे नाभि चक्र को शुद्ध करती है। यह असंतोष, धन का अत्यधिक लोभ, पारिवारिक कलह, और कट्टरता *(Fanaticism)* जैसी समस्याओं से उत्पन्न हुई बाधाओं को दूर करती है।

* *_दाहिना नाभि (Right Nabhi):_* यह हमारे लीवर (Liver) को नियंत्रित करता है। अत्यधिक सोचने, भविष्य की चिंता करने और गुस्सैल स्वभाव के कारण यह चक्र पकड़ में आ जाता है। आज का ध्यान लीवर को ठंडा करने और शांत करने में मदद करता है।

* *_बायां नाभि (Left Nabhi):_* यह हमारे स्प्लीन (Spleen) को नियंत्रित करता है और गृहस्थ जीवन की समस्याओं से संबंधित है। एक गृहणी *(Gruhalakshmi)* की स्थिति, पारिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ, या पारिवारिक कलह के कारण यह चक्र पकड़ में आ सकता है। माँ चंद्रघंटा की कृपा से बाएं नाभि में संतुलन आता है और घर में शांति स्थापित होती है।

* *_भवसागर (The Void):_* नाभि चक्र भवसागर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। जब नाभि संतुलित होती है, तो यह हमारे भीतर गुरु सिद्धांत को स्थापित करने में मदद करती है। हम स्वयं के गुरु बन जाते हैं।

*श्री माताजी ने नाभि की पकड़ के बारे में चेतावनी दी थी:*
*"पैसे के बारे में बहुत ज्यादा मत सोचो। जब आप हर समय पैसे, नौकरी, भविष्य की चिंता करते हैं, तो आपका दाहिना नाभि पूरी तरह से खराब हो जाता है और आपका लीवर गर्म हो जाता है। यह सारी गर्मी आपके पूरे सिस्टम में फैल जाती है। शांत हो जाओ! अपनी माँ पर विश्वास रखो। वह तुम्हारी सभी जरूरतों का ख्याल रखेगी। तुम यहाँ सत्य को खोजने आए हो, पैसा कमाने नहीं।"*

_*आज के दिन सहजयोगियों का क्या कर्तव्य है?*_

आज एक सहजयोगी के रूप में, हमें इस दिन की दिव्य ऊर्जा का पूर्ण लाभ उठाने के लिए अपनी दिनचर्या में कुछ विशेष बातों को शामिल करना चाहिए।

*1. _श्री लक्ष्मी-नारायण की स्तुति:_*
दिन की शुरुआत श्री लक्ष्मी-नारायण के आवाहन से करें। हम उनके मंत्रों का जाप कर सकते हैं। यह हमारे नाभि चक्र को जागृत करता है और हमारे भीतर पालन-पोषण और कल्याण के गुणों को स्थापित करता है। हमें उनसे प्रार्थना करनी चाहिए, *_"हे श्री लक्ष्मी-नारायण, कृपा करके हमारे भीतर धर्म को स्थापित करें और हमें पूर्ण संतोष प्रदान करें।_"*

*2. _श्री चंद्रघंटा का आवाहन:_*
इसके बाद, हमें माँ आदिशक्ति के तीसरे स्वरूप, श्री चंद्रघंटा देवी का आवाहन करना चाहिए। हम उनके मंत्र का जाप कर सकते हैं:

*_"ॐ त्वमेव साक्षात् श्री चंद्रघंटा साक्षात् श्री आदिशक्ति माताजी श्री निर्मला देव्यै नमो नमः"_*
यह मंत्र उनके निर्भय और शांत स्वरूप को हमारे भीतर जागृत करता है।

*3. _संतुलन की साधना:_*
* *_संतुलित आहार:_* आज के दिन बहुत भारी या मसालेदार भोजन करने से बचें। सात्विक और संतुलित आहार लें जो आपके पेट *(नाभि)* के लिए अच्छा हो। सहजयोग में उपवास करने के लिए नहीं कहा गया है, बल्कि संतुलन साधने के लिए कहा गया है।

* *_उदारता का अभ्यास:_* आज कुछ दान करें या किसी जरूरतमंद की मदद करें। उदारता नाभि चक्र को खोलने का सबसे अच्छा तरीका है। जब हम देते हैं, तो हम ब्रह्मांड से और अधिक प्राप्त करने के लिए खुल जाते हैं।

* *_पारिवारिक शांति:_* आज अपने परिवार में शांति और सौहार्द का माहौल बनाए रखें। बहस या झगड़े से बचें। एक शांत और प्रेमपूर्ण पारिवारिक वातावरण नाभि चक्र के लिए सबसे अच्छी औषधि है।

*श्री माताजी ने गृहलक्ष्मी के महत्व पर बहुत जोर दिया है:*
*"घर की स्त्री को गृहलक्ष्मी होना चाहिए। उसे घर में शांति, प्रेम और पवित्रता का वातावरण बनाना चाहिए। जब गृहलक्ष्मी प्रसन्न होती है, तो उस घर में साक्षात श्री लक्ष्मी का वास होता है। उस घर में कभी कोई कमी नहीं होती।"*

*4. _आइस पैक का उपयोग:_*
यदि आपको दाहिने नाभि या लीवर में गर्मी महसूस होती है, या आप बहुत अधिक सोचते हैं, तो आज ध्यान के दौरान या रात को सोते समय अपने पेट के दाहिने हिस्से *(लीवर पर)* पर आइस पैक का उपयोग करें। यह दाहिने नाभि की गर्मी को शांत करने का एक बहुत ही प्रभावी सहज उपचार है।

*_ध्यान और धारणा: तृतीय दिवस की साधना_*

आज की ध्यान प्रक्रिया में हमें अपना पूरा चित्त *(Attention)* नाभि चक्र पर केंद्रित करना है।

*_ध्यान की विधि:_*
* सर्वप्रथम, सहजयोग विधि के अनुसार बंधन लें और अपनी कुंडलिनी को उठाकर सहस्रार पर स्थापित करें।
* श्री लक्ष्मी-नारायण और श्री चंद्रघंटा का आवाहन करें।
* अब अपना सीधा हाथ *(Right Hand)* अपने नाभि चक्र पर रखें *(पेट पर नाभि के स्थान पर)*।
* श्री माताजी से प्रार्थना करें: *"श्री माताजी, कृपा करके मेरे नाभि चक्र के सभी दोषों, बाधाओं और नकारात्मकताओं को नष्ट कर दें। कृपा करके मेरे भीतर सच्चा धर्म स्थापित करें। कृपा करके मुझे पूर्ण समाधान प्रदान करें।"*
* अब प्रार्थना करें: *"श्री माताजी, आप ही सच्ची श्री लक्ष्मी हैं। कृपा करके मेरे परिवार में और मेरे जीवन में अपना आशीर्वाद बनाए रखें।"*
* कुछ देर इसी स्थिति में रहकर अपने नाभि चक्र पर चैतन्य के प्रवाह को महसूस करें।
* अब दोनों हाथ श्री माताजी की ओर करके, आँखें बंद करके ध्यान में बैठ जाएं। अपना पूरा चित्त नाभि चक्र पर रखें।
* उस स्थान पर श्री चंद्रघंटा के स्वरूप का ध्यान करें और उनके मंत्र का मन ही मन जाप करें।
* अनुभव करें कि आपके भीतर की सारी बेचैनी, चिंता और असंतोष शांत हो रहा है और आप एक गहरी आंतरिक शांति का अनुभव कर रहे हैं।
* ध्यान के अंत में, पुनः बंधन लेकर कुंडलिनी को सहस्रार पर बांध लें और माँ को हृदय से धन्यवाद दें।

*श्री माताजी ने ध्यान में प्रार्थना की शक्ति के बारे में कहा:*
*"जब आप हृदय से प्रार्थना करते हैं, तो मैं सुनती हूँ। आपकी हर प्रार्थना का उत्तर दिया जाता है। आपको बस एक बच्चे की तरह, पूरी मासूमियत से माँगना है। अपनी माँ से माँगने में कोई शर्म नहीं है। वह आपको वह सब कुछ देगी जो आपके आध्यात्मिक विकास के लिए अच्छा है।"*

_*आत्म-निरीक्षण: अपने नाभि को कैसे जांचें?*_

आज का दिन अपने भीतर झाँकने और स्वयं से कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न पूछने का है:
* क्या मैं अपने जीवन से संतुष्ट हूँ, या मैं हमेशा और अधिक की तलाश में रहता/रहती हूँ?
* क्या मैं पैसे और भौतिक संपत्ति के बारे में बहुत अधिक चिंता करता/करती हूँ?
* क्या मेरे परिवार में शांति और प्रेम का माहौल है?
* क्या मैं एक कंजूस व्यक्ति हूँ या एक उदार व्यक्ति?
* क्या मैं कट्टर या असहिष्णु हूँ? क्या मैं दूसरों के विचारों का सम्मान करता/करती हूँ?
* क्या मेरा पेट अक्सर खराब रहता है या मुझे पाचन संबंधी समस्याएं हैं?

इन प्रश्नों के उत्तर आपको यह समझने में मदद करेंगे कि आपके नाभि चक्र की स्थिति क्या है। यदि आपको कोई कमी महसूस होती है, तो उसे पूरी ईमानदारी के साथ स्वीकार करें और उसे ठीक करने के लिए श्री माताजी से शक्ति मांगें।

_*श्री माताजी के उपदेशों का सार: तृतीय दिवस के लिए*_
* *_संतोष ही सबसे बड़ा धन है:_* अपनी जरूरतों को सीमित करें और जो है उसमें खुश रहना सीखें।
* *_धर्म पर चलें:_* अपने जीवन में संतुलन, नैतिकता और विवेक को अपनाएं।
* *_उदार बनें:_* देने में जो आनंद है, वह लेने में नहीं है। अपना हृदय और हाथ दोनों खुले रखें।
* *_पारिवारिक सद्भाव:_* परिवार समाज की इकाई है। अपने परिवार में शांति बनाए रखें, यही आपकी सबसे बड़ी पूजा है।

*श्री माताजी का आश्वासन:*
*"चिंता मत करो। तुम मेरे बच्चे हो। तुम्हारी हर ज़रूरत का ध्यान रखा जाएगा। तुम बस अपना चित्त परमात्मा पर रखो। अपनी कुंडलिनी को जगाओ, अपने चक्रों को साफ करो, और ध्यान में गहरे उतरो। बाकी सब मैं देख लूँगी। मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ है।"*

*_सामूहिक प्रार्थना_*

आइए, हम सब मिलकर इस तृतीय दिवस के समापन पर अपनी करुणामयी माँ, श्री आदिशक्ति माताजी श्री निर्मला देवी के श्री चरणों में प्रार्थना करें:

*"हे हमारी माँ, ब्रह्मांड की पालनकर्ता!*
*आज नवरात्रि के इस तीसरे पावन दिवस पर, हम सब आपके बच्चे, आपके श्री चरणों में अपनी नाभि को रखते हैं।*
*हे माँ, कृपा करके हमारे इस जीवन-केंद्र को शुद्ध कर दीजिए। हमारे भीतर के सभी असंतोष, लोभ, और चिंताओं को नष्ट कर दीजिए।*
*हे माँ चंद्रघंटा, हमें अपने घंटे की दिव्य ध्वनि से जागृत करें। हमें हर प्रकार के भय से मुक्त करें और हमें धर्म के मार्ग पर चलने की शक्ति दें।*
*हे श्री लक्ष्मी-नारायण, कृपा करके हमें आंतरिक संतोष और समाधान का आशीर्वाद दें। हमारे घरों में, हमारे परिवारों में और हमारे दिलों में शांति स्थापित करें।*
*माँ, हमें एक संतुलित, धार्मिक और प्रेमपूर्ण जीवन जीने का आशीर्वाद दें, ताकि हम आपके सच्चे सहजयोगी बन सकें और आपके प्रेम को पूरी दुनिया में फैला सकें।"*

*_जय श्री माताजी!_*

*जय श्री माताजी!💕🙏*_*आज नवरात्रि का तृतीय दिवस है।*_https://whatsapp.com/channel/0029VbB4EYj7T8bWLtEng22Rचैतन्य की लहरों...
24/09/2025

*जय श्री माताजी!💕🙏*
_*आज नवरात्रि का तृतीय दिवस है।*_
https://whatsapp.com/channel/0029VbB4EYj7T8bWLtEng22R

चैतन्य की लहरों पर सवार होकर, अपनी आध्यात्मिक यात्रा के तीसरे पड़ाव पर आज हम सब सहजयोगी आ पहुंचे हैं। नवरात्रि का यह तीसरा दिन, माँ आदिशक्ति के एक अत्यंत शक्तिशाली और जागृत स्वरूप को समर्पित है। यह दिन हमारे भीतर धर्म, संतुलन, समाधान और आंतरिक शांति की स्थापना का दिन है।

आज, इस विशेष दिवस पर, हम अपनी परम पूज्यनीय माता, श्री माताजी निर्मला देवी द्वारा प्रदान किए गए ज्ञान के असीम सागर में डुबकी लगाएंगे और नवरात्रि के तीसरे दिन के सूक्ष्म से सूक्ष्म रहस्यों को जानने का प्रयास करेंगे। हम श्री माताजी के उपदेशों के प्रकाश में समझेंगे कि इस दिन का महत्व क्या है, माँ का यह स्वरूप हमारे सूक्ष्म तंत्र के किस केंद्र को पोषित करता है, और आज के दिन एक सहजयोगी को अपनी साधना में क्या करना चाहिए।

यह विस्तृत लेख दो भागों में प्रस्तुत है, जो आपको इस दिन की दिव्यता में गहराई से उतरने में सहायता करेगा।

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*_भाग १: धर्म और समाधान का केंद्र - श्री चंद्रघंटा और नाभि चक्र_*

*_प्रस्तावना: तीसरे दिवस का दिव्य स्पंदन_*

नवरात्रि के पहले दो दिनों में, हमने श्री शैलपुत्री की कृपा से अपने मूलाधार को दृढ़ किया और श्री ब्रह्मचारिणी की शक्ति से अपने स्वाधिष्ठान में रचनात्मकता और शुद्ध ज्ञान की ज्योति प्रज्वलित की। अब हमारी कुंडलिनी माँ अपनी यात्रा में तीसरे ऊर्जा केंद्र, *नाभि चक्र* पर आ पहुंची हैं।

आज का दिन, तृतीया तिथि, माँ दुर्गा के तीसरे स्वरूप, *श्री चंद्रघंटा देवी*, को समर्पित है। माँ का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है, इसीलिए इन्हें *'चंद्रघंटा'* कहा जाता है। उनका शरीर स्वर्ण के समान कांतिवान है। वे सिंह पर सवार हैं, और उनकी दस भुजाएं विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित हैं। उनका यह स्वरूप हमें दर्शाता है कि वे दुष्टों का दमन करने के लिए सदैव तत्पर रहती हैं, परंतु अपने भक्तों के लिए वे अत्यंत सौम्य और करुणामयी हैं। उनके घंटे की ध्वनि भक्तों को सभी प्रकार के भय से मुक्त करती है।

सहजयोग में, तीसरा दिन हमारे जीवन में संतुलन और धर्म की स्थापना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। श्री चंद्रघंटा देवी हमारे *नाभि चक्र* की अधिष्ठात्री देवी हैं, जो हमारे जीवन में धर्म, संतोष, उदारता और पारिवारिक कल्याण को नियंत्रित करता है।

*श्री माताजी ने तीसरे दिन के महत्व को उजागर करते हुए अपने एक प्रवचन में कहा था:*
*"तीसरा दिन नाभि चक्र का है। नाभि चक्र हमारे जीवन का केंद्र है। यहीं से हमारा पोषण होता है। जब तक आपकी नाभि ठीक नहीं होती, आपको जीवन में संतोष नहीं मिल सकता। आप हमेशा असंतुष्ट और बेचैन रहेंगे। देवी का चंद्रघंटा स्वरूप आपके इसी केंद्र को शांति और समाधान से भर देता है। उनकी कृपा से ही आपके भीतर सच्चा धर्म स्थापित होता है।"*

*_श्री चंद्रघंटा देवी: स्वरूप का सूक्ष्म रहस्य_*

माँ चंद्रघंटा का स्वरूप गहन आध्यात्मिक अर्थों से परिपूर्ण है, जो एक साधक को समझना चाहिए।

* *_चंद्रमा और घंटा:_* *'चंद्रमा'* हमारे मन और हमारी भावनाओं *(इड़ा नाड़ी)* का प्रतीक है। 'घंटा' की ध्वनि से उत्पन्न होने वाला दिव्य नाद *(ॐ)* सभी नकारात्मक शक्तियों को दूर भगाता है और चैतन्य की जागृति का प्रतीक है। माँ के मस्तक पर चंद्रमा का होना यह दर्शाता है कि उन्होंने अपने मन और भावनाओं पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त कर लिया है। वह हमें भी अपने मन को शांत और संतुलित रखने की प्रेरणा देती हैं। घंटे की ध्वनि हमें बाहरी दुनिया के शोर से हटाकर अपने भीतर की शांति में स्थित होने के लिए सचेत करती है।

* *_दस भुजाएं और अस्त्र-शस्त्र:_* माँ की दस भुजाएं दसों दिशाओं पर उनके नियंत्रण का प्रतीक हैं। यह दर्शाता है कि वे सर्वव्यापी हैं और हर दिशा से अपने भक्तों की रक्षा करती हैं। उनके हाथों में अस्त्र-शस्त्र नकारात्मकता और आसुरी शक्तियों के विनाश के लिए हैं। यह हमें सिखाता है कि एक साधक को भी अपने भीतर की नकारात्मकताओं - जैसे क्रोध, लोभ, अहंकार - से लड़ने के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए।

* *_सिंह की सवारी:_* सिंह शौर्य, पराक्रम और धर्म का प्रतीक है। जब देवी धर्म के आसन *(सिंह)* पर विराजमान होती हैं, तो संसार में धर्म की स्थापना होती है। यह हमें निर्भय होकर सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने की शक्ति प्रदान करता है।

* *_शांत और सौम्य मुख:_* युद्ध के लिए तत्पर होते हुए भी माँ का मुख अत्यंत शांत और सौम्य है। यह सहजयोग का सार है - बाहरी दुनिया में अपने सभी कर्तव्य निभाते हुए भी, भीतर से पूर्णतः शांत और साक्षी भाव में स्थित रहना।

*श्री माताजी ने देवी के स्वरूपों की दिव्यता पर प्रकाश डालते हुए कहा:*
*"लोग समझते हैं कि देवी के दस हाथ और इतने सारे अस्त्र-शस्त्र केवल एक कल्पना है। नहीं! यह सत्य है। जब आपके भीतर कुंडलिनी जागृत होती है और चक्रों को खोलती है, तो आपके भीतर ये सभी शक्तियां जागृत हो जाती हैं। आप स्वयं सिंह की तरह निर्भय हो जाते हैं। आप अपने भीतर की सभी नकारात्मकताओं को नष्ट करने की शक्ति प्राप्त करते हैं। यह सब आपके भीतर ही घटित होता है।"*

*_नाभि चक्र: हमारे अस्तित्व का पोषण केंद्र_*

श्री चंद्रघंटा देवी हमारे सूक्ष्म शरीर के तीसरे ऊर्जा केंद्र, नाभि चक्र *(जिसे मणिपुर चक्र भी कहते हैं)* को नियंत्रित करती हैं। यह चक्र हमारी रीढ़ की हड्डी में नाभि के ठीक पीछे स्थित होता है। इसकी दस पंखुड़ियाँ होती हैं और इसका तत्व जल है *(हालांकि यह अग्नि तत्व से भी निकटता से संबंधित है)।*

नाभि चक्र हमारे जीवन का केंद्र बिंदु है। गर्भ में, बच्चा इसी नाभि से अपनी माँ से जुड़कर पोषण प्राप्त करता है। आध्यात्मिक स्तर पर भी, यह चक्र हमारे पोषण, कल्याण, संतोष और विकास को नियंत्रित करता है।

इस चक्र के मुख्य देवता *श्री लक्ष्मी-नारायण* *(विष्णु)* हैं। श्री विष्णु इस संपूर्ण ब्रह्मांड के पालनकर्ता हैं, और देवी लक्ष्मी धन, समृद्धि और कल्याण की देवी हैं।

*श्री माताजी ने नाभि चक्र की केंद्रीय भूमिका को समझाया:*
*"आपका नाभि चक्र बहुत महत्वपूर्ण है। यह आपके स्वाधिष्ठान को नियंत्रित करता है और आपके हृदय चक्र को सहारा देता है। यहीं पर धर्म का स्थान है। जब लोग धर्म से भटक जाते हैं, तो उनकी नाभि खराब हो जाती है। पैसे के पीछे भागना, असंतोष, पारिवारिक समस्याएं, ये सब खराब नाभि के लक्षण हैं। सहजयोग में आने के बाद, आपकी पहली प्राथमिकता अपनी नाभि को ठीक करना होनी चाहिए, क्योंकि यहीं से आपको सच्ची शांति और संतोष मिलेगा।"*

*_धर्म की स्थापना: तीसरे दिन का मुख्य उद्देश्य_*

आज के दिन का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है - *अपने भीतर धर्म की स्थापना करना*।

सहजयोग में, धर्म का अर्थ किसी बाहरी पंथ या संप्रदाय से नहीं है। धर्म का अर्थ है, वह आंतरिक संतुलन और आचार संहिता जो मनुष्य को धारण करती है और उसे उसकी आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर बनाए रखती है। श्री माताजी ने समझाया कि मनुष्य का सच्चा धर्म 'मानव धर्म' है, जो उसे परमात्मा की खोज के लिए प्रेरित करता है।

नाभि चक्र में धर्म के दस आधार *(Ten Valencies)* स्थित हैं, जो हमें संतुलित और धार्मिक जीवन जीने का तरीका सिखाते हैं। ये हैं - धैर्य, क्षमा, आत्म-नियंत्रण, चोरी न करना, पवित्रता, इंद्रियों पर नियंत्रण, विवेक, ज्ञान, सत्य और क्रोध न करना।

जब हमारा नाभि चक्र शुद्ध और संतुलित होता है, तो ये सभी गुण सहजता से हमारे स्वभाव में आ जाते हैं। हम स्वाभाविक रूप से एक धार्मिक और संतुलित जीवन जीने लगते हैं।

*श्री माताजी ने धर्म के वास्तविक अर्थ पर जोर देते हुए कहा:*
*"धर्म आपको बांधता नहीं है, यह आपको स्वतंत्र करता है। सच्चा धर्म आपके भीतर है। यह आपके नाभि चक्र में स्थित है। जब आपकी कुंडलिनी नाभि चक्र को भेदती है, तो वह आपके भीतर इस धर्म को जागृत करती है। तब आपको किसी बाहरी नियम या किताब की जरूरत नहीं पड़ती। आप स्वयं ही जान जाते हैं कि क्या सही है और क्या गलत। आपका विवेक जागृत हो जाता है।"*

*_संतोष (Samadhan): नाभि की कुंजी और आंतरिक शांति का स्रोत_*

नाभि चक्र का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण गुण है - *संतोष या समाधान*।

आधुनिक मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या असंतोष है। वह हमेशा और अधिक की चाह में भागता रहता है - और अधिक पैसा, और अधिक शक्ति, और अधिक संपत्ति। यह निरंतर दौड़ उसकी नाभि को पूरी तरह से खराब कर देती है, जिससे चिंता, तनाव, उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसी बीमारियाँ होती हैं।

नाभि चक्र हमें सिखाता है कि सच्चा सुख बाहर की चीजों में नहीं, बल्कि भीतर के संतोष में है। जब हम अपनी जरूरतों को सीमित करते हैं और जो हमारे पास है, उसके लिए परमात्मा का धन्यवाद करते हैं, तो हमारी नाभि शांत और संतुलित हो जाती है।

*श्री माताजी ने संतोष के महत्व पर एक सुंदर उपदेश दिया:*
*"जिस व्यक्ति को संतोष नहीं है, वह दुनिया का सबसे गरीब व्यक्ति है, चाहे उसके पास कितना भी धन क्यों न हो। और जिस व्यक्ति को संतोष है, वह सबसे अमीर है, चाहे उसके पास कुछ भी न हो। संतोष की यह भावना श्री लक्ष्मी की कृपा से आती है। जब आपकी नाभि ठीक होती है, तो देवी लक्ष्मी आपके भीतर निवास करती हैं, और आपको पूर्ण संतोष प्रदान करती हैं। आप हर परिस्थिति में प्रसन्न और शांत रहते हैं।"*

आज, श्री चंद्रघंटा के दिन, हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम अपनी इच्छाओं और अपनी दौड़ को रोकेंगे। हम ध्यान में बैठकर अपने भीतर उस शांति और संतोष को खोजेंगे जो हमारा स्वरूप है। जब हमारा नाभि चक्र मजबूत होगा, तो हमारी भौतिक और आध्यात्मिक दोनों जरूरतें माँ स्वयं पूरी करेंगी, हमें चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं होगी।
*जय श्री माताजी 🙏*
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