24/10/2021
"मनुष्य जीवन का वास्तविक प्रयोजन "
आज मैं आपलोगों को एक बालक भक्त की कथा सुनाऊँगा
जिनका नाम प्रह्लाद महाराज था! वे घोर नास्तिक परिवार मे जन्मे थे!
इस संसार मे दो प्रकार के मनुष्य हैं - असुर तथा देवता! उनमें अंतर क्या है? मुख्य अंतर यह है कि देवतागण भगवान के प्रति अनुरक्त रहते हैं जबकि असुरगण नास्तिक होते हैं ! वे ईश्वर में इसलिये विश्वास नही करते, क्योंकि वे भौतिकवादी होते हैं ! मनुष्यों की ये दोनो श्रेणियां इस संसार मे सदैव विद्यमान रहती हैं ।
कलियुग (कलह का युग) होने से सम्प्रति असुरों की संख्या बढ़ी हुई है किन्तु यह वर्गीकरण सृष्टी के प्रारम्भ से चला आ रहा है। आपलोगों से मैं जिस घटना का वर्णन करने जा रहा हूँ वह सृष्टी के कुछ लाख वर्षों बाद घटी।
प्रह्लाद महाराज सर्वाधिक नास्तिक एवं भौतिक रूप से सर्वाधिक शक्तिशाली व्यक्ति के पुत्र थे । चूँकि उस समय का समाज भौतिकवादी था अतैव इस बालक को भगवान के यशोगान का अवसर ही नही मिलता था । महात्मा का लक्षण् यह होता है की वह भगवान की महिमा का प्रसार करने के लिए अत्यधिक उत्सुक रहता है ।
जब प्रह्लाद महाराज पाँच वर्ष के बालक थे , तो उन्हें पाठशाला भेजा गया। जैसे ही मनोरंजन का अंतराल आता और शिक्षक बाहर चला जाता वे अपने मित्रो से कहते मित्रो!आओ। हम कृष्णभावनामृत के विषय मे चर्चा करें।"
यह दृश्य श्रीमद्भागवतम् के सप्तम स्कंध के छठे अध्याय मे वर्णित है। भक्त प्रह्लाद कहते है , "मित्रो !
यह बाल्यावस्था ही कृषण्भावनामृत अनुशीलन करने का उचित समय है ।"और उनके बालमित्र उत्तर देते हैं,
"ओह ! हम तो खेलेंगे। हम कृष्ण -भावनामृत क्यों ग्रहण करे?" प्रतिउत्तर मे प्रह्लाद महाराज कहते हैं, "यदि तुम लोग बुद्धिमान हो, तो बाल्यावस्था से ही भागवत धर्म प्रारम्भ करो ।"
श्रीमद्भागवतम् भागवत-धर्म प्रस्तुत करता है अर्थात यह ईश्वर विषयक वैज्ञानिक ज्ञान तक ले जाता है। भागवत का अर्थ है, "पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्" और धर्म का अर्थ है, "विधि-विधान ।" यह मानव जीवन अति दुर्लभ है। यह एक महान सुयोग है। इसलिए प्रह्लाद कहते हैं "मित्रों ! तुम लोग सभ्य मनुष्यों के रूप मे उत्पन्न हुए हो, अतः तुम्हारा ये मनुष्य शरीर क्षणभंगुर होते हुए भी महानतम सुयोग है।" कोई भी व्यक्ति अपनी जीवन अवधि नही जानता। ऐसी गणना की जाती है कि इस युग मे मनुष्य-शरीर एक सौ वर्षों तक जीवित रह सकता है। किन्तु जैसे-जैसे कलयुग आगे बढ़ता जाता है, जीवन की अवधि,स्मृति,दया,धार्मिकता तथा अन्य ऐसी ही विभूतियाँ घटती जाती है। अतएव इस युग मे दीर्घायु अनिश्चित है।
यद्यपि मनुष्य का स्वरूप क्षणिक है, फिर भी इस मनुष्य रूप मे आप जीवन की सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त कर सकते हैं। वह सिद्धि क्या है? सर्वव्यापक भगवान को जान लेना। अन्य योनियों में यह संभव नही है । चूँकि हम क्रमिक विकास द्वारा यह मनुष्य रूप प्राप्त करते है इसलिए यह दुर्लभ अवसर है। प्रकृति के नियमानुसार आपको अनन्तः मनुष्य शरीर दिया जाता है जिससे आप आध्यात्मिक जीवन को प्राप्त करके भगवद्धाम वापस जा सकें।
"जीवन का चरम लक्ष्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु या कृष्ण हैं"
बाद में एक श्लोक में प्रह्लाद महाराज कहते हैं, "इस भौतिक जगत् के जो लोग भौतिक शक्ति द्वारा मोहित हो जाते है, वे यह नही जानते की मनुष्य-जीवन का लक्ष्य क्या है? क्यों? क्योकि वे भगवान् की चकाचोंध करने वाली बहिरंगा शक्ति द्वारा मोहित हो चुके हैं। वे भूल चुके हैं कि जीवन तो सिद्धि के चरम लक्ष्य भगवान् विष्णु को समझने के लिए एक सुअवसर है।" विष्णु या ईश्वर को समझने के लिए हमें क्यों अतीव उत्सुक होना चाहिए? प्रह्लाद महाराज कारण समझाते है, "विष्णु सर्वाधिक प्रिय व्यक्ति हैं। हम यह भूल चुके हैं।" हम सब किसी प्रिय मित्र की खोज में रहते हैं- हर व्यक्ति इस प्रकार की खोज करता है। "पुरुष स्त्री के साथ प्रिय मैत्री करना चाहता है और स्त्री पुरुष के साथ मैत्री करना चाहती है या फिर एक पुरुष अन्य पुरुष को खोजता है और एक स्त्री अन्य स्त्री को खोजती है। हर व्यक्ति किसी न किसी प्रिय,मधुर मित्र की तलाश मे रहता है। ऐसा क्यों? क्योंकि हम ऐसे प्रिय मित्र का सहयोग चाहते हैं जो हमारी सहायता कर सके। यह जीवन संघर्ष का अंग है और यह स्वाभाविक है। किन्तु हम यह नही जानते कि हमारे सर्वाधिक प्रिय मित्र पूर्ण पुरषोतम भगवान् विष्णु हैं।
जिन्होंने भगवद्गीता का अध्ययन किया है,उन्हें पांचवे अध्याय में यह उत्तम श्लोक मिला होगा, "यदि आप शांति चाहते हैं, तो आपको स्पष्ट रूप से यह समझना होगा कि इस लोक की तथा अन्य लोकों की हर वस्तु कृष्ण की संपत्ति है, वे ही हर वस्तु के भोक्ता हैं एवं वे ही हर एक के परम मित्र हैं।" तो फिर तपस्या क्यों की जाये ? ये सारे कार्य भगवान् को प्रसन्न करने के अतिरिक्त और किसी के निमित्त नहीं है । और जब भगवान् प्रसन्न होते हैं तो आपको फल मिलता है। आप चाहे उच्चतर भौतिक सुख की कामना करते हो या आध्यात्मिक सुख की, आप चाहे इस लोक में श्रेष्ठतर जीवन बिताना चाहते हों या अन्य लोको में, यदि आप भगवान् को प्रसन्न कर लेते हैं तो आप उनसे मनवांछित फल प्राप्त कर सकेंगे। इसलिए वे अत्यंत निष्ठावान मित्र हैं। किन्तु बुद्धिमान व्यक्ति ऐसी कोई वस्तु नहीं चाहता जो भौतिक रूप से कलुषित हो।
भगवद्गीता में कृष्ण कहते हैं कि पुण्य कर्मों से मनुष्य सर्वोच्च भौतिक लोक अर्थात ब्रह्मलोक को प्राप्त कर सकता है जहाँ पर जीवन की अवधि करोड़ो वर्ष की है। आप वहाँ की जीवन-अवधि की गणना नही कर सकते, आपका सारा गणित का ज्ञान निष्फल हो जाता है। भगवद्गीता मे कहा गया है कि ब्रह्मा का जीवन इतना दीर्घ है कि हमारे 4,32,00,00,000 वर्ष उनके बारह घंटो के तुल्य हैं। कृष्ण कहते हैं, "तुम चींटी से लेकर ब्रह्मा तक कोई भी पद इच्छानुसार प्राप्त कर सकते हो पर वहां पर भी जन्म-मरण की पुनरावृत्ति होगी। किन्तु यदि तुम कृष्णभावनामृत का अभ्यास करके मेरे पास आते हो,तो तुम्हें इस कष्ट-प्रद भौतिक जगत् में पुनः नही आना होगा।"
प्रह्लाद महाराज यही बात कहते है, "हमें अपने सर्वाधिक प्रिय मित्र,परम भगवान् कृष्ण की खोज करनी चाहिए" वे हमारे सर्वाधिक प्रिय मित्र क्यों हैं? वे स्वाभिक रूप से प्रिय हैं। क्या आपने कभी विचार किया है कि आप किसे सर्वाधिक प्रिय वस्तु मानते हैं? आप स्वयं ही वह सर्वाधिक प्रिय वस्तु हैं। उदाहरणार्थ मैं यहाँ बैठा हूँ किन्तु यदि आग लगने की चेतावनी दी जाये, तो मैं तुरंत अपनी रक्षा के विषय में सोचूँगा। मैं सर्वप्रथम सोचूंगा कि मैं अपने आप को किस प्रकार बचा सकता हूँ । तब हम अपने मित्रों और अपने संबंधियो तक को भूल जाते हैं और यही भाव रहता है कि सर्वप्रथम मैं अपने को बचा लूँ । आत्म-रक्षा प्रकृति का सर्वप्रथम नियम है।
स्थूल दृश्टिकोण से आत्मा, "स्वयं" शब्द का अर्थ शरीर है किन्तु सूक्ष्म अर्थ में मन या बुद्धि ही आत्मा है। और वस्तुतः आत्मा का अर्थ आत्मा ही है। स्थूल अवस्था में हम अपने शरीर की रक्षा करने तथा उसे तुष्ट करने में अत्यधिक रुचि लेते हैं किन्तु सूक्ष्मतर अवस्था में मन तथा बुद्धि को तुष्ट करने में रुचि लेते हैं। किन्तु मानसिक तथा बौद्धिक स्तर के ऊपर, जहाँ का वातावरण अध्यात्मिकृत है, हम यह समझ सकते है कि अहं ब्रहास्मि अर्थात् "मैं यह मन, बुद्धि या शरीर नही हूँ- मैं तो आत्मा हूँ - भगवान् का भीन्नाशं।" यही है वास्तविक समझ या ज्ञान का स्तर या पद।
प्रह्लाद महाराज कहते हैं कि समस्त जीवों में से विष्णु परम हितैषी हैं। इसलिए हम सभी उनकी खोज में लगे हैं। जब बालक रोता है, तो वह क्या चाहता है? अपनी माता। किन्तु इसे व्यक्त करने के लिए उसके पास कोई भाषा नही होती। स्वभावतः उसके पास उसका शरीर है जो उसकी माता के शरीर से उत्पन्न होता है अतएव अपनी माता के शरीर से उसका घनिष्ट संबंध होता हैं। बालक अन्य किसी स्त्री को नही चाहेगा। बालक रोता है किन्तु जब वह स्त्री ,जो बालक की माँ होती है, आती है और उसे गोद में उठा लेती है तो वह बालक शांत हो जाता है। यह सब व्यक्त करने के लिए उसके पास कोई भाषा नही होती किन्तु उसकी माता से उसका संबंध प्रकृति का नियम है। इसी तरह हम स्वाभिक रूप से शरीर की रक्षा करना चाहते है। यह आत्म-संरक्षण हैं। यह जीव का प्राकृतिक नियम है और सोना भी प्राकृतिक नियम है। तो मैं शरीर की रक्षा क्यों करु? क्योकि इस शरीर के भीतर आत्मा है।
इस भौतिक जगत् में जीव एक आध्यात्मिक प्राणी है, किन्तु उसमें भोग करने की अर्थात भौतिक शक्ति का शोषण करने की प्रवृति होती है। इसलिए उसे शरीर प्राप्त हुआ है। जीवों की 84,00,000 योनियाँ हैं और हर योनि का पृथक् शरीर है। शरीर के अनुसार ही उसमे विशिष्ट इन्द्रिया होती हैं जिनसे वे किसी विशेष आनंद का भोग कर सकते हैं। मान लीजिये कि आपको एक कँटीली झाड़ी दे दी जाये और कहा जाय , "देवियों और सज्जनो! यह एक अत्युत्तम भोजन है। यह ऊंटो द्वारा प्रमाणित है। यह अति उत्तम है।" तो क्या आप इसे खाना पसंद करेंगे?" नहीं, आप यह क्या व्यर्थ की वस्तु मुझे दे रहे हैं?" आप कहेंगे, चूँकि आपको ऊँट से भिन्न शरीर मिला हुआ है अतएव आपको कँटीली झाड़िया नही भाती। किन्तु यही झाड़ी ऊँट को दे दी जाये तो वह सोचेगा कि यह तो अत्युत्तम आहार है।
यदि सुअर तथा ऊँट बिना विकट संघर्ष के इन्द्रिय तृप्ति का भोग कर सकते है तो हम मनुष्य क्यों नहीं कर सकते? हम कर सकते हैं किन्तु यह हमारी चरम उपलब्धि नहीं होगी। चाहे कोई सुअर या ऊँट अथवा मनुष्य, इन्द्रिय तृप्ति भोगने की सुविधाएँ प्रकृति द्वारा प्रदान की जाती हैं। अतएव वे सुविधाएँ जो आपको प्रकृति के नियम द्वारा मिलनी ही है उनके लिए आप श्रम क्यों करें? प्रत्येक योनि में शारीरिक माँगो की तुष्टि की व्यवस्था प्रकृति द्वारा की जाती है। इस तृप्ति की व्यवस्था उसी तरह की जाती है जिस तरह दुःख की व्यवस्था की जाती रहती है। क्या आप चाहेंगे की आपको ज्वर चढ़े? नहीं। ज्वर क्यों चढ़ता है? मैं नही जानता। किन्तु यह चढ़ता ही है, है न! क्या आप इसके लिए प्रयास करते है? नहीं, तो यह चढ़ता कैसे है? प्रकृति से। यही एकमात्र उत्तर है। यदि आपका कष्ट प्रकृति द्वारा प्रदत्त है तो आपका सुख भी प्रकृतिजन्य है। इसके विषय मे चिंता न करें। यही प्रहलाद महाराज का आदेश है। यदि आपको बिना प्रयास के ही जीवन में कष्ट मिलते हैं, तो सुख भी बिना प्रयास के प्राप्त होगा।
तो इस मनुष्य जीवन का वास्तविक प्रयोजन क्या है? "कृष्णभावनामृत का अनुशीलन" अन्य सारी वस्तुऍ प्रकृति के नियमो द्वारा, जो अनंततः ईश्वर का नियम है,प्राप्त हो जायेंगी। यदि मैं प्रयास न भी करूँ तो मुझे अपने विगत कर्म तथा शरीर के कारण, जो भी मिलना है, वह प्रदान किया जायेगा। अतएव आपकी मुख्य चिंता मनुष्य जीवन के उच्चतर लक्ष्य को खोज निकालने की होनी चाहिए।
स्रोत:-- श्रील प्रभुपाद की पुस्तक "प्रह्लाद महाराज के दिव्य उपदेश, अध्याय १" से साभार
नित्य जपिये
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।।
और खुश रहिये।