Nav Yuvak Mitra Mandal Bhadal Sundar

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महाभारत के अठारह दिनों के उस महाविनाशकारी युद्ध ने हस्तिनापुर की महारानी को भीतर तक तोड़कर रख दिया था। द्रौपदी, जो अभी अप...
14/01/2026

महाभारत के अठारह दिनों के उस महाविनाशकारी युद्ध ने हस्तिनापुर की महारानी को भीतर तक तोड़कर रख दिया था। द्रौपदी, जो अभी अपनी आयु के मध्य में थीं, उस समय अस्सी वर्ष की किसी वृद्धा-सी शिथिल और निस्तेज प्रतीत हो रही थीं। यह थकान केवल शारीरिक नहीं थी; उनकी आत्मा और चेतना युद्ध की विभीषिका से छलनी हो चुकी थी।

हस्तिनापुर का राजमहल, जो कभी उत्सवों और वैभव से गूँजता था, अब एक विशाल श्मशान-सा लग रहा था। चारों ओर केवल विधवाओं का क्रंदन था, पुरुष तो गिने-चुने ही शेष बचे थे। अनाथ बच्चे दिशाहीन होकर भटक रहे थे, जिनकी आँखों में भविष्य का भय स्पष्ट था। इस असीम शोक के बीच, अपने कक्ष में शून्य को निहारती हुई द्रौपदी पाषाण-वत बैठी थीं। उनकी आँखों के आँसू भी जैसे सूख चुके थे।

तभी कक्ष के द्वार पर एक परिचित आहट हुई। द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण ने भीतर प्रवेश किया।

अपने सखा, अपने रक्षक को देखते ही द्रौपदी का वर्षों से सँजोया हुआ संयम का बाँध टूट गया। वह सुध-बुध खोकर दौड़ीं और कृष्ण से लिपट गईं। उनके भीतर दबा हुआ सारा दुख, सारा अवसाद आंसुओं के रूप में बह निकला। कृष्ण ने कुछ नहीं कहा, बस मौन रहकर स्नेहपूर्वक उनके सिर पर हाथ फेरते रहे। वे जानते थे कि इस समय शब्दों की नहीं, सांत्वना के स्पर्श की आवश्यकता है।
जब द्रौपदी का मन तनिक हल्का हुआ, तो कृष्ण ने उन्हें अपने से अलग किया और पास ही पलंग पर बैठा दिया।

रुंधे हुए गले और कातर स्वर में द्रौपदी ने पूछा, "यह क्या हो गया, सखा? मैंने तो ऐसे अंत की कल्पना कभी नहीं की थी। क्या इसी रक्तपात के लिए मैंने प्रतिशोध की अग्नि अपने हृदय में जलाई थी?"
कृष्ण ने अत्यंत शांत और गंभीर स्वर में उत्तर दिया, "पांचाली, नियति अत्यंत क्रूर होती है। वह हमारी इच्छाओं या भावनाओं से नहीं, बल्कि हमारे कर्मों के परिणामों से संचालित होती है। तुम प्रतिशोध चाहती थीं, और देखो, तुम सफल हुईं। न केवल दुर्योधन और दुःशासन, बल्कि सम्पूर्ण कौरव वंश का विनाश हो गया। तुम्हें तो अपनी विजय पर प्रसन्न होना चाहिए।"

द्रौपदी तड़प उठीं। उन्होंने पीड़ा भरे स्वर में कहा, "सखा! तुम मेरे घावों पर मरहम लगाने आए हो या उन पर नमक छिड़कने?"
कृष्ण की आँखों में करुणा थी, पर वाणी में सत्य की कठोरता। "नहीं द्रौपदी, मैं तुम्हें केवल सत्य का दर्पण दिखाने आया हूँ। हम अक्सर आवेश में किए गए अपने कर्मों के दूरगामी परिणामों को नहीं देख पाते। और जब वे परिणाम सामने आते हैं, तब वे इतने भयावह होते हैं कि उन्हें रोकना किसी के बस में नहीं रहता।"

द्रौपदी का स्वर काँप उठा, "तो क्या इस महाविनाश का पूर्ण उत्तरदायित्व केवल मेरा है, कृष्ण?"

"नहीं, स्वयं को इतना महत्वपूर्ण मत समझो, द्रौपदी," कृष्ण ने समझाया, "परंतु यह भी सत्य है कि यदि तुमने अपने अतीत में थोड़ी सी भी दूरदर्शिता और संयम बरता होता, तो शायद आज तुम इतना कष्ट न भोग रही होतीं।"

द्रौपदी ने प्रश्नभरी दृष्टि से उनकी ओर देखा, "मैं क्या कर सकती थी?"

कृष्ण ने अतीत के पन्ने पलटते हुए धीमे लेकिन स्पष्ट शब्दों में कहा, "तुम बहुत कुछ कर सकती थीं, सखा। स्मरण करो अपना स्वयंवर। यदि उस दिन तुम कर्ण का अपमान न करतीं और उसे प्रतियोगिता में भाग लेने का अवसर देतीं, तो संभवतः परिणाम कुछ और होते। कर्ण का आहत स्वाभिमान ही उस दिन प्रतिशोध का बीज बन गया था।"

कृष्ण क्षण भर रुके, फिर बोले, "और जब माता कुंती ने भूलवश तुम्हें पाँच पतियों की पत्नी बनने का आदेश दिया, तब यदि तुम उस अनुचित आदेश को अस्वीकार कर देतीं, तो आज परिस्थितियाँ भिन्न होतीं। मौन रहना भी कभी-कभी विनाश को आमंत्रण देना होता है।"
द्रौपदी निशब्द सुनती रहीं, पर कृष्ण की अगली बात ने उनके हृदय को वेध दिया।

"और सबसे बड़ी भूल... अपने इंद्रप्रस्थ के मायावी महल में। जब दुर्योधन भ्रमित होकर गिर पड़ा था, तब तुमने उपहास में कहा था—'अंधों के पुत्र अंधे ही होते हैं'। यदि वह एक वाक्य तुम्हारे मुख से न निकला होता, तो दुर्योधन के हृदय में प्रतिशोध की वह ज्वाला न धधकती जो अंततः चीरहरण जैसी विभीषिका और इस महायुद्ध का कारण बनी।"

कृष्ण ने गहरी दृष्टि से द्रौपदी को देखा और जीवन का सबसे गूढ़ सत्य कहा—

"द्रौपदी, हमारे शब्द केवल हवा में गूँजने वाली ध्वनियाँ नहीं हैं, वे भी हमारे 'कर्म' हैं। हर शब्द को बोलने से पहले उसे तौलना अनिवार्य है। क्योंकि बाण का घाव भर सकता है, पर शब्दों का घाव कभी नहीं भरता। शब्दों के दुष्परिणाम केवल बोलने वाले को ही नहीं, बल्कि पूरे परिवेश को दुख और विनाश की अग्नि में झोंक देते हैं।"

अंत में, वातावरण की निस्तब्धता को चीरते हुए कृष्ण ने कहा, "इस समस्त सृष्टि में, मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जिसका ज़हर उसके दाँतों में नहीं, बल्कि उसके 'शब्दों' में होता है। इसलिए, भविष्य में शब्दों का प्रयोग सदैव सोच-समझकर करना, पांचाली।"
द्रौपदी अवाक रह गईं। युद्ध समाप्त हो चुका था, पर ज्ञान का एक नया अध्याय अभी-अभी खुला था।

06/12/2025

किसी ने खूब लिखा है यदि "महाभारत" को पढ़ने का

समय न हो तो भी इसके नौ सार

-सूत्र हमारे जीवन में उपयोगी

सिद्ध हो सकते हैं।

1. संतानों की गलत माँग और

हठ पर समय रहते अंकुश नहीं

लगाया गया,तो अंत में आप

असहाय हो जायेंगे।

कौरवों को देख लें

2. आप भले ही कितने बलवान

हो लेकिन अधर्म के साथ हो तो,

आपकी विद्या,अस्त्र-शस्त्र शक्ति

और वरदान सब निष्फल हो जायेगा।

कर्ण को देख लें।

3. संतानों को इतना महत्वाकांक्षी

मत बना दो कि विद्या का दुरुपयोग

कर स्वयंनाश कर सर्वनाश को

आमंत्रित करे।

अश्वत्थामा को देख लें।

4. कभी किसी को ऐसा वचन

मत दो कि आपको अधर्मियों

के आगे समर्पण करना पड़े।

भीष्म पितामह को देख लें।

5. संपत्ति,शक्ति व सत्ता का

दुरुपयोग और दुराचारियों का

साथ अंत में स्वयंनाश का दर्शन

कराता है।

दुर्योधन को देख लें।

6. मुद्रा,मदिरा,अज्ञान,मोह,काम

और अंधव्यक्ति के हाथ में सत्ता

भी विनाश की ओर ले जाती है।

धृतराष्ट्र को देख लें।

7. यदि व्यक्ति के पास विद्या,

विवेक से बँधी हो तो विजय

अवश्य मिलती है।

अर्जुन को देख लें।

8. हर कार्य में छल,कपट,

व प्रपंच रच कर आप हमेशा

सफल नहीं हो सकते।

शकुनि को देख लें।

9. यदि आप नीति,धर्म,व कर्म

का सफलता पूर्वक पालन करेंगे,

तो विश्व की कोई भी शक्ति आपको

पराजित नहीं कर सकती।

युधिष्ठिर को देख लें।

जयति सनातन

जयतु भारतं

12/09/2025

मैं अपनी पत्नी और बच्चों के साथ चाट के ठेले पर दहीबड़े खा रहा था...अचानक ठेले वाले ने अपने बीस-बाईस साल के बेटे को खींचकर थप्पड़ मारा और झुँझलाते हुए बोला... " तुझे कितनी बार समझाया है कि कांजी के पानी वाला कुरछा दहीबड़ों में मत डाला कर...इसका अलग कुरछा रखा है न... "

पिता का यह व्यवहार देखकर मुझे अच्छा नहीं लगा...
मैंने कहा...
"भाई साहब, यह सही बात नहीं है... यहाँ भरी सड़क पर जवान बेटे को थप्पड़ मारना मूर्खता है..."

मेरी बात सुनकर ठेलेवाले की आँखों में आँसू आ गए...
वह भरे गले से बोला...
"क्या करूँ साहब, जब यह बार-बार गलती करता है तब मुझसे रहा नहीं जाता... एम.ए. कर रहा है फिर भी चूक करता है...शायद अब मैं भी ज़रा चिड़चिड़ा हो गया हूँ..."

पिता के आँसू देख लड़का मेरी ओर मुड़ा और गुस्से में बोला...
"गलत मेरे पापा नहीं हैं साहब, गलत आप हैं जो एक बेटे के सामने बाप को गलत सिद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं...यह मेरे पिता हैं... इनका मुझ पर पूरा हक है...ये चाहे मुझे थप्पड़ मारें या डाँटें, मुझे कोई शिकायत नहीं...जब मुझे शिकायत नहीं है तो आप क्यों टोक रहे हैं...और सुन लीजिए, बाप कभी गलत नहीं होता, हमेशा औलाद ही गलत होती है..."
इतना कहकर उसने अपने पिता के आँसू पोंछे और बोला...
"पापा, खुद को दुखी मत कीजिए...जब आप मुझे थप्पड़ मारते हैं तब मुझे अच्छा लगता है... बुरा तो तब लगता है जब आप कई दिनों तक मुझ पर हाथ नहीं उठाते... तब मुझे लगता है कि शायद अब आपको मेरी फिक्र ही नहीं रही..."

पत्नी और बच्चे मुझे अजीब नज़रों से देख रहे थे...जैसे मेरी पत्नी आँखों ही आँखों से कह रही हो, अब समझ आया, दूसरों के पचड़े में पड़ने का नतीजा...

मैंने तुरंत पैसे चुकाए और परिवार को लेकर वहाँ से चल पड़ा...थोड़ी ही दूर जाकर बच्चे फिर पानीपुरी खाने लग गए, लेकिन मेरा मन कहीं और उलझा हुआ था...उस लड़के के शब्द मेरे भीतर नगाड़ों की तरह गूँज रहे थे और बरसों से बंद पड़े एक दरवाज़े को खोल रहे थे...

मुझे अपने पापा याद आ रहे थे...दस साल हो गए थे उनसे मिले हुए...वजह बस इतनी-सी थी कि एक दिन पापा ने मेरी पत्नी के सामने मुझे डाँट दिया था...मैं नाराज़ होकर बोला, अब मैं बड़ा हो गया हूँ, अब आपकी यह डाँट अच्छी नहीं लगती...
यह सुनकर पापा गुस्से में अपनी जूती निकाल लाए और चिल्लाते हुए बोले, मुझसे बड़ा हो गया है क्या? बता दूँ तुझे अभी...
वह जूती मेरे कान के पास से निकल गई...मैं बच गया था लेकिन भीतर आग भर गई थी... उसी रात मैंने ठान लिया कि अब इस घर में नहीं रहूँगा...

सुबह चार बजे पत्नी को लेकर मैं चुपके से घर छोड़ आया...माँ, पापा, भाई और भाभी सब पीछे रह गए...सब पापा से डरते थे, मगर मैं बोल जाता था...मुझे लगता था कि पापा गलत हैं...पर आज उस लड़के के शब्द गूँज रहे थे कि बाप कभी गलत नहीं होता, हमेशा औलाद ही गलत होती है...और मेरे भीतर सवाल उठ रहा था कि क्या सचमुच गलती मेरी ही थी?

उस रात नींद नहीं आई...पत्नी ने देखा तो बोली, लगता है ठेले वाले लड़के की बात दिल को लग गई है... मैं उदास होकर बोला, हाँ, सच है...पापा कभी गलत नहीं होते, उनकी हर बात में हमारा भला छुपा होता है...

पत्नी ने प्यार से समझाया, फिर चिंता क्यों? इस बार दिवाली गाँव चलते हैं... ससुर जी से मिलना होगा...देखना, वे आपको तुरंत माफ कर देंगे...अगर गुस्से में फिर एक आध जूता भी मार दें तो सह लेना, जैसे बचपन में सहा करते थे...

सुबह जब हम गाँव पहुँचे तो माँ, भाई, भाभी और भतीजों के चेहरे खिल उठे...दस साल बाद मैंने घर की देहरी लाँघी थी...बैठक में पापा कम्बल ओढ़े सोए हुए थे.. Mमैंने चुपचाप उनके चरण छुए... वे जागे, चश्मा लगाया और मुझे देखा... चेहरे पर वर्षों की नाराजगी थी... फिर बिना कुछ कहे कम्बल से चेहरा ढक लिया...मेरे पाँव वहीं जम गए... बोलने की हिम्मत नहीं थी...

मैंने बेटे बिट्टू को पास बुलाया...
वह दादाजी से बहुत स्नेह करता था...उसने जाकर पापा का कम्बल खींचा और बोला, दादू, देखो पापा आपसे बात करना चाहते हैं... पापा ने पलटकर कहा,
अपने बाप से कह दो यहाँ से चला जाए...मुझे इससे कोई बात नहीं करनी...

मेरी आँखों में आँसू आ गए...मैं पापा के चरण पकड़कर चुपचाप रो पड़ा...बिट्टू बोला, दादू, पापा रो रहे हैं... मैं सिसकते हुए बोला, माफ कर दो पापा... बहुत देर बाद समझ आया कि आप सही थे, गलती मेरी थी...

पापा शायद इन्हीं शब्दों का इंतज़ार कर रहे थे...झटके से बैठकर बोले...
"आ बेटा, बहुत दिन हो गए तुझे सीने से लगाए हुए..मन करता था कि सारी नाराजगी छोड़कर तेरे पास आ जाऊँ, मगर तू भी तो पत्थर बना हुआ था...."
और फिर हम गले मिले। बरसों का बिछोह मिट गया...लगा जैसे जड़ों से कटे पेड़ को फिर से अपनी मिट्टी मिल गई हो, जैसे बरगद की छाँव में लौट आया हूँ...

उस साल की दिवाली सबसे यादगार थी...दस साल का वनवास खत्म हो गया था...पापा और माँ को मैं अपने साथ शहर ले आया... कुछ ही महीनों में पापा का स्वास्थ्य सँभल गया...चेहरे पर पहले जैसी ताजगी लौट आई...

नोट :- पिता वो नीव है, जिस पर हमारा पूरा जीवन खड़ा होता है ! पिता वह वट वृक्ष की तरह है, जिसकी छांव में हमें सुकून मिलता है, पिता की मौजूदगी हर मुश्किल को आसान बना देती है! एक पिता की ममता बिना बोले समझ आती है, पिता के बिना जिंदगी अधूरी सी लगती है, पिता की डांट बच्चों को सही गलत का फर्क सिखाती है, जिससे हम जिंदगी के असली सबक सीखते हैं, जब भी हौसला डगमगाता है उनकी आंखों का भरोसा हमें थाम लेता है ! हर मुश्किल में चट्टान की तरह वह हमारे पीछे खड़े होते हैं ! पिता सिर्फ पिता ही नहीं बल्कि जीवन के सबसे अच्छे दोस्त भी होते हैं जिससे आप अपनी हर बात कह सकते हैं।
माता- पिता बच्चों के लिए ईश्वर का सबसे बड़ा उपहार है 🙏

साभार

04/09/2025

🙏 खत्म होने जा रहा है एक युग🙏

आने वाले 15 / 20 साल में एक पीढी संसार छोड़ कर जाने वाली है । जो सीनियर सिटीजन है । जिनकी उम्र इस समय लगभग 60 -80 साल की है।

*इस पीढ़ी के लोग बिलकुल अलग ही हैं ।*

*रात को जल्दी सोने वाले , सुबह जल्दी जागने वाले , भोर में घूमने निकलने वाले ।*

*आंगन और पौधों को पानी देने वाले , देवपूजा के लिए फूल तोड़ने वाले , पूजा अर्चना करने वाले , प्रतिदिन मंदिर जाने वाले ।*

*रास्ते में मिलने वालों से बात करने वाले , उनका सुख दु:ख पूछने वाले , दोनो हाथ जोड कर प्रणाम करने वाले , पूजा किये बगैर अन्नग्रहण न करने वाले ।*

*उनका अजीब सा संसार है । तीज त्यौहार , मेहमान शिष्टाचार , अन्न , धान्य , सब्जी , भाजी की चिंता करने वाले । तीर्थयात्रा , रीति रिवाज , सनातन धर्म के इर्द गिर्द घूमने वाले ।*

*पुराने फोन पे ही मोहित , फोन नंबर की डायरियां मेंटेन करने वाले , रॉन्ग नम्बर से भी बात कर लेने वाले , समाचार पत्र को दिन भर में दो-तीन बार पढ़ने वाले ।*

*हमेशा एकादशी याद रखने वाले , अमावस्या और पूर्णमासी याद रखने वाले लोग , भगवान पर प्रचंड विश्वास रखने वाले , समाज का डर पालने वाले , पुरानी चप्पल , बनियान , चश्मे वाले ।*

*गर्मियों में अचार पापड़ बनाने वाले , घर का कुटा हुआ मसाला इस्तेमाल करने वाले और हमेशा देशी टमाटर , बैंगन , मेथी , साग भाजी ढूंढने वाले ।*

*नज़र उतारने वाले ।*

*क्या आप जानते हैं कि ये सभी लोग धीरे धीरे , हमारा साथ छोड़ के जा रहे हैं ।*

*क्या आपके घर में भी ऐसा कोई है ? यदि हाँ , तो उनका बेहद ख्याल रखें ।*

*अन्यथा एक महत्वपूर्ण सीख , उनके साथ ही चली जायेगी । वो है , संतोषी जीवन , सादगीपूर्ण जीवन , प्रेरणा देने वाला जीवन , मिलावट और बनावट रहित जीवन , धर्म सम्मत मार्ग पर चलने वाला जीवन और सबकी फिक्र करने वाला आत्मीय जीवन ।*

*आपके परिवार में जो भी बडे हों , तो उनको मान सन्मान और अपनापन , समय तथा प्यार दीजिये , उन्हें उनके जीवन को स्वच्छंदता से तथा खुले मन से जीने दीजिए । हो सके तो उनके कुछ पद चिन्हो पर चलने की कोशिश करे ।*

*संस्कार ही*
*अपराध रोक सकते हैं !*
*सरकार नहीं !!*

*Last but not the least .*

यह मानव इतिहास की आखिरी पीढ़ीहै , जिसने अपने बड़ों की सुनी और अब अपने छोटों की भी सुन रहे हैं ।
* #जय श्री राधे कृष्णा 🙏🙏🙏

बचपन में हम देखते थे कि घर के पुरुषों के बाहर जाने पर घर की महिलाएं कभी किवाड़ तुरंत बन्द नहीं करती थी, सांकल खुली छोड़ ...
29/08/2025

बचपन में हम देखते थे कि घर के पुरुषों के बाहर जाने पर घर की महिलाएं कभी किवाड़ तुरंत बन्द नहीं करती थी, सांकल खुली छोड़ देती थीं। कभी कभी पुरुष कुछ दूर जाकर लौट आते थे, ये कहते हुए कि कुछ भूल गया हूं और मुस्कुरा देते थे दोनों एक दूसरे को देखकर।

एक बार बच्चे ने अपनी मां से पूछ लिया कि मां पापा के जाने के बाद कुछ देर तक दरवाजा क्यों खुला रखती हो??

तब मां ने बच्चे को वो गूढ़ बात बताई जो हमारी सांस्कृतिक विरासत है। उन्होंने बच्चे को कहा कि किवाड़ की खुली सांकल किसी के लौटने की एक उम्मीद होती है। अगर कोई अपना हमसे दूर जा रहा है तो हमे उसके लौटने की उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए। उसका इंतजार जीवन के आखिरी पल तक करना चाहिए।

आस और विश्वास से रिश्तों की दूरी मिट जाती है, इसीलिए मैं दिल की उम्मीद के साथ दरवाजे की सांकल भी खुली रखती हूं, जब भी वापस आए तो उसे खटकाने की जरूरत नहीं पड़े, वो खुद मन के घर में आ जाए।

जीवन में कुछ बातें हमेशा हमे सीख देती है, कि कोई रिश्तों से नाराज कितना भी हो, उसके लिए दिल के दरवाजे बन्द मत करो। जब कभी उसे आपकी याद आयेगी, उसे आपके पास आना हो तो वो हिचके नही, मस्ती में पूरे विश्वास से बिना कुंडी खटकाए दिल के अन्दर आ जाए।

विज्ञान हमें कहां से कहां ले आया !हम तो फिर भी कहेंगे और सब कहते हैं कि विज्ञान बहुत तरक्की कर रहा है पर बीमारी घटने के ...
17/08/2024

विज्ञान हमें कहां से कहां ले आया !
हम तो फिर भी कहेंगे और सब कहते हैं कि विज्ञान बहुत तरक्की कर रहा है पर बीमारी घटने के बजाय बढ़ कैसे रही है ?
हर घर में कोई ना कोई दवाई क्यों खा रहा है? नहीं पता न ?

मैं बताता हूँ, हुआ ये है कि हमारे रसोई की मूलभूत चीजों में बहुत मिलावट, गिरावट और घटियापन आ गया है।
कौन कौन सी हैं वो चीजें ?
1. नमक
2. गुड़
3. तेल
4. घी
5. दूध
6. आटा
7. पानी
8. शक्कर

जी हाँ बस इन चीजों में सुधार कीजिये और 6 महीनो में फर्क देखिये।
1. सब से पहले समुंद्री नमक- आयोडीन नमक को बदल के सेंधा नमक (रॉक सॉल्ट) कर दीजिये, वो भी बड़े टुकड़े लाके घर में ही कूट लें और हाँ नमक केवल रसोई बनाते वक्त ही डालें। टेबल पे रख के भोजन के समय डालने की आदत छोड़ें।

2. गुड़ हमेशा डार्क चॉकलेट कलर का ही लायें।सफ़ेद गुड़ में मिलावट होती है।
3. Refined oil के बदले घानी का फिल्टर तेल ही खायें, वो भी मुंगफली, तिल या सरसों; कोई अन्य नहीं।

4. घी असली वो है जो देसी गाय के दूध से दहीं, दहीं से मख्खन और मख्खन से बनता है। सीधे मलाई निकाल के या विदेशी गाय के दूध से जो बनता है, वो बटर आयल है, घी नहीं।
5. दूध पिओ तो केवल देसी गाय का, नहीं तो पिओगे ही नहीं तो कोई नुकसान नहीं है।

6. आटा हमेशा मोटा पिसवाओ और बिना चोकर निकले प्रयोग में लाओ। मैदा कभी ना खायें।

7. पानी हमेशा मटके का या गुनगुना ही पीओ। ठंडा फ्रिज का पानी कभी नहीं पीना।
8. चीनी सफ़ेद जहर है। उसकी जगह गुड़ ही खायें या शक्कर जो थोड़ी पीली होती है। बड़े टुकडों में मिलती है, उसे प्रयोग करें।

अब आप कहेंगे इतना कुछ कौन करेगा ? टाइम नहीं है, तो टेंसन नहीं लेने का, मस्त से जियो,
कुछ नहीं होता है।

तो दोस्तों, आस-पास के जो लोग गोलियां खा रहे हैं, वो भी ऐसा ही सोचते थे लेकिन
अब वो हॉस्पिटल में डॉक्टर के चक्कर काटने में टाइम निकाल ही रहे हैं।

थोड़ा सा बदलाव और सेहत बनाओ।

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Vrindavan
Mathura
281504

Telephone

9368497368

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