22/08/2026
#वन्दे_मातरम् : राष्ट्रचेतना, शक्ति, समृद्धि और संपूर्णता का स्वर*
लेखक: डॉ संतोष पटेल
हमारे #राष्ट्रगीत वन्दे मातरम् के #पंचम_पद में हमारी मातृभूमि को केवल भूमि नहीं, बल्कि शक्ति का स्वरूप, समृद्धि का प्रतीक और ज्ञान की देवी के रूप में प्रस्तुत किया गया।
वन्दे मातरम्!
हे माँ! मैं तुम्हें नमन करता हूँ!
त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी!
तुम ही शक्ति की अधिष्ठात्री माँ दुर्गा हो!
कमला कमलदल-विहारिणी!
तुम ही समृद्धि और सौभाग्य प्रदान करने वाली माँ लक्ष्मी हो!
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्!
तुम ही ज्ञान एवं विद्या की देवी माँ सरस्वती हो!
हे माँ! मैं तुम्हें नमन करता हूँ!
नमामि कमलां! अमलां! अतुलां!
मैं उस मातृभूमि को नमन करता हूँ—
जो कमल के समान सुंदर है!
जो निर्मल और पवित्र है!
जो अतुलनीय है!
सुजलां! सुफलां! मातरम्!
जो जल से समृद्ध है!
जो फलों और अन्न से परिपूर्ण है!
और वह भारत माता
हमारी शक्ति है!
हमारी समृद्धि है!
हमारा ज्ञान है!
और हमारी पहचान है!
यही वह मातृभूमि है, जिसके लिए हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना सर्वस्व समर्पित किया।
यही वह मातृभूमि है, जिसके प्रति सम्मान और समर्पण की भावना ने स्वतंत्रता आंदोलन को जन-जन का आंदोलन बनाया।
वन्दे मातरम् केवल शब्द नहीं हैं—
यह भारत की राष्ट्रीय चेतना का स्वर है!
यह मातृभूमि के प्रति श्रद्धा का भाव है!
यह त्याग, तपस्या और राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा है!
लेकिन विचार करने का विषय यह भी है कि जिस संपूर्ण वन्दे मातरम् में हमारी मातृभूमि को शक्ति, समृद्धि और ज्ञान के रूप में वंदित किया गया है, उसके पूर्ण स्वरूप को हम लंबे समय तक अपनी सार्वजनिक प्रस्तुतियों में क्यों नहीं ला पाए।
स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक सार्वजनिक प्रसारणों में मुख्यतः इसके प्रारंभिक दो पदों का ही प्रयोग होता रहा। जब वर्ष 2026 में संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव पारित कर वंदे मातरम् के छह-स्तबकीय पूर्ण संस्करण को आधिकारिक रूप से प्रसारित करने की व्यवस्था भी हुई l
आज प्रश्न केवल इतना नहीं है कि हम वन्दे मातरम् का कितना भाग गाते हैं।
प्रश्न यह है कि क्या हम अपनी राष्ट्रीय विरासत को उसकी संपूर्णता में जानने और समझने के लिए तैयार हैं?
यदि किसी को इसके किसी पद के अर्थ, ऐतिहासिक संदर्भ या प्रस्तुति को लेकर कोई प्रश्न है, तो लोकतंत्र में उस पर संवाद हो सकता है।
लेकिन किसी राष्ट्रीय गीत के गायन को जानबूझकर रोकना या उसके गायन में व्यवधान उत्पन्न करना अब कानून के दायरे में भी आया है।
2026 के Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Act के माध्यम से ‘वन्दे मातरम्’ को भी उस कानूनी संरक्षण के दायरे में लाया गया है, जो पहले राष्ट्रगान के लिए था। जानबूझकर राष्ट्रगीत के गायन को रोकना या उसके गायन में लगी सभा में व्यवधान उत्पन्न करना दंडनीय बनाया गया है।
ऐसे में हमारा दायित्व और भी बढ़ जाता है।
हमें किसी व्यक्ति या समुदाय के विरुद्ध खड़े होने की आवश्यकता नहीं है।
हमें राष्ट्रीय भावना के पक्ष में खड़े होना है।
हमें विवाद नहीं चाहिए—
हमें संवाद चाहिए।
हमें विभाजन नहीं चाहिए—
हमें एकता चाहिए।
हमें विरोध नहीं चाहिए
हमें राष्ट्रहित चाहिए।
और हमें अपनी राष्ट्रीय विरासत के प्रति उपेक्षा नहीं—
बल्कि सम्मान चाहिए।
क्योंकि—
भारत माता हमारी शक्ति है!
भारत माता हमारी समृद्धि है!
भारत माता हमारा ज्ञान है!
भारत माता हमारी पहचान है!
और इस भारत माता की एकता, अखंडता और संप्रभुता को बनाए रखने के लिए—
करोड़ों कंठों से आवाज उठती है!
करोड़ों भुजाएँ उठ खड़ी होती हैं!
और जब करोड़ों कंठ एक स्वर में बोलते हैं,
तो वह केवल किसी गीत की ध्वनि नहीं होती—
वह भारत की एकता की आवाज होती है
वह भारत की अखंडता की आवाज होती है!
वह भारत की संप्रभुता की आवाज होती है!
वह भारत के गौरव की आवाज होती है!
आइए, हम सब संकल्प लें—
हम अपनी राष्ट्रीय विरासत का सम्मान करेंगे!
हम भारत की एकता और अखंडता को मजबूत करेंगे!
हम संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करेंगे!
और मातृभूमि के गौरव को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचायेंगे।
#भारत माता की जय!!!
#वंदे_मातरम