नर्मदा साहित्य मंथन

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नर्मदा साहित्य मंथन
देश का प्रतिष्ठित साहित्योत्सव लिटरेचर फेस्टिवल….
भारत को समझने और भारतीयता को सशक्त करने के लिये नर्मदा साहित्य मंथन, पंचम्-सोपान 'भारत उदय' में 30 जनवरी 2026 से 01 फरवरी 2026

(संकुचित राजनैतिक विमर्श बनाम शाश्वत सामाजिक सत्य)डॉ. मयंक चतुर्वेदी वैचारिक शून्यता और तात्कालिक राजनैतिक लाभ के इस आधु...
23/08/2026

(संकुचित राजनैतिक विमर्श बनाम शाश्वत सामाजिक सत्य)

डॉ. मयंक चतुर्वेदी

वैचारिक शून्यता और तात्कालिक राजनैतिक लाभ के इस आधुनिक दौर में, भारत के प्राचीन वाङ्मय को बिना समझे उस पर प्रहार करना एक फैशन बन चुका है।
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#मनुस्मृति

क्या वंदे मातरम् इस्लाम के खिलाफ है? जानें कैसे डॉ. कलाम, मौलाना आजाद और अन्य हस्तियों ने इसे राष्ट्रीय सम्मान दिया। राष...
22/08/2026

क्या वंदे मातरम् इस्लाम के खिलाफ है? जानें कैसे डॉ. कलाम, मौलाना आजाद और अन्य हस्तियों ने इसे राष्ट्रीय सम्मान दिया। राष्ट्रप्रेम ही सबसे बड़ा मजहब है।

जानें 'वन्दे मातरम्' का गौरवशाली इतिहास और 2026 के नए कानून के तहत राष्ट्रीय गीत के अपमान पर मिलने वाली कानूनी सुरक्षा औ...
22/08/2026

जानें 'वन्दे मातरम्' का गौरवशाली इतिहास और 2026 के नए कानून के तहत राष्ट्रीय गीत के अपमान पर मिलने वाली कानूनी सुरक्षा और प्रोटोकॉल की पू #वन्देमातरम्
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#वन्देमातरम्

 #वन्दे_मातरम् : राष्ट्रचेतना, शक्ति, समृद्धि और संपूर्णता का स्वर*लेखक: डॉ संतोष पटेलहमारे  #राष्ट्रगीत वन्दे मातरम् के...
22/08/2026

#वन्दे_मातरम् : राष्ट्रचेतना, शक्ति, समृद्धि और संपूर्णता का स्वर*
लेखक: डॉ संतोष पटेल
हमारे #राष्ट्रगीत वन्दे मातरम् के #पंचम_पद में हमारी मातृभूमि को केवल भूमि नहीं, बल्कि शक्ति का स्वरूप, समृद्धि का प्रतीक और ज्ञान की देवी के रूप में प्रस्तुत किया गया।
वन्दे मातरम्!
हे माँ! मैं तुम्हें नमन करता हूँ!
त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी!
तुम ही शक्ति की अधिष्ठात्री माँ दुर्गा हो!
कमला कमलदल-विहारिणी!
तुम ही समृद्धि और सौभाग्य प्रदान करने वाली माँ लक्ष्मी हो!
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्!
तुम ही ज्ञान एवं विद्या की देवी माँ सरस्वती हो!
हे माँ! मैं तुम्हें नमन करता हूँ!
नमामि कमलां! अमलां! अतुलां!
मैं उस मातृभूमि को नमन करता हूँ—
जो कमल के समान सुंदर है!
जो निर्मल और पवित्र है!
जो अतुलनीय है!
सुजलां! सुफलां! मातरम्!
जो जल से समृद्ध है!
जो फलों और अन्न से परिपूर्ण है!
और वह भारत माता
हमारी शक्ति है!
हमारी समृद्धि है!
हमारा ज्ञान है!
और हमारी पहचान है!
यही वह मातृभूमि है, जिसके लिए हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना सर्वस्व समर्पित किया।
यही वह मातृभूमि है, जिसके प्रति सम्मान और समर्पण की भावना ने स्वतंत्रता आंदोलन को जन-जन का आंदोलन बनाया।
वन्दे मातरम् केवल शब्द नहीं हैं—
यह भारत की राष्ट्रीय चेतना का स्वर है!
यह मातृभूमि के प्रति श्रद्धा का भाव है!
यह त्याग, तपस्या और राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा है!
लेकिन विचार करने का विषय यह भी है कि जिस संपूर्ण वन्दे मातरम् में हमारी मातृभूमि को शक्ति, समृद्धि और ज्ञान के रूप में वंदित किया गया है, उसके पूर्ण स्वरूप को हम लंबे समय तक अपनी सार्वजनिक प्रस्तुतियों में क्यों नहीं ला पाए।
स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक सार्वजनिक प्रसारणों में मुख्यतः इसके प्रारंभिक दो पदों का ही प्रयोग होता रहा। जब वर्ष 2026 में संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव पारित कर वंदे मातरम् के छह-स्तबकीय पूर्ण संस्करण को आधिकारिक रूप से प्रसारित करने की व्यवस्था भी हुई l
आज प्रश्न केवल इतना नहीं है कि हम वन्दे मातरम् का कितना भाग गाते हैं।
प्रश्न यह है कि क्या हम अपनी राष्ट्रीय विरासत को उसकी संपूर्णता में जानने और समझने के लिए तैयार हैं?
यदि किसी को इसके किसी पद के अर्थ, ऐतिहासिक संदर्भ या प्रस्तुति को लेकर कोई प्रश्न है, तो लोकतंत्र में उस पर संवाद हो सकता है।
लेकिन किसी राष्ट्रीय गीत के गायन को जानबूझकर रोकना या उसके गायन में व्यवधान उत्पन्न करना अब कानून के दायरे में भी आया है।
2026 के Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Act के माध्यम से ‘वन्दे मातरम्’ को भी उस कानूनी संरक्षण के दायरे में लाया गया है, जो पहले राष्ट्रगान के लिए था। जानबूझकर राष्ट्रगीत के गायन को रोकना या उसके गायन में लगी सभा में व्यवधान उत्पन्न करना दंडनीय बनाया गया है।
ऐसे में हमारा दायित्व और भी बढ़ जाता है।
हमें किसी व्यक्ति या समुदाय के विरुद्ध खड़े होने की आवश्यकता नहीं है।
हमें राष्ट्रीय भावना के पक्ष में खड़े होना है।
हमें विवाद नहीं चाहिए—
हमें संवाद चाहिए।
हमें विभाजन नहीं चाहिए—
हमें एकता चाहिए।
हमें विरोध नहीं चाहिए
हमें राष्ट्रहित चाहिए।
और हमें अपनी राष्ट्रीय विरासत के प्रति उपेक्षा नहीं—
बल्कि सम्मान चाहिए।
क्योंकि—
भारत माता हमारी शक्ति है!
भारत माता हमारी समृद्धि है!
भारत माता हमारा ज्ञान है!
भारत माता हमारी पहचान है!
और इस भारत माता की एकता, अखंडता और संप्रभुता को बनाए रखने के लिए—
करोड़ों कंठों से आवाज उठती है!
करोड़ों भुजाएँ उठ खड़ी होती हैं!
और जब करोड़ों कंठ एक स्वर में बोलते हैं,
तो वह केवल किसी गीत की ध्वनि नहीं होती—
वह भारत की एकता की आवाज होती है
वह भारत की अखंडता की आवाज होती है!
वह भारत की संप्रभुता की आवाज होती है!
वह भारत के गौरव की आवाज होती है!
आइए, हम सब संकल्प लें—
हम अपनी राष्ट्रीय विरासत का सम्मान करेंगे!
हम भारत की एकता और अखंडता को मजबूत करेंगे!
हम संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करेंगे!
और मातृभूमि के गौरव को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचायेंगे।
#भारत माता की जय!!!
#वंदे_मातरम

क्या विवाह की भव्यता हमारे पारिवारिक मूल्यों को खत्म कर रही है? जानिए क्यों दिखावे के दौर में रिश्ते टूट रहे हैं और कैसे...
18/08/2026

क्या विवाह की भव्यता हमारे पारिवारिक मूल्यों को खत्म कर रही है? जानिए क्यों दिखावे के दौर में रिश्ते टूट रहे हैं और कैसे बचाएं अपना घर-परिवार।
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तकनीक की जीत या संवेदनाओं की हार?क्या हम आधुनिकता की अंधी दौड़ में अपने संस्कारों का अंतिम संस्कार कर रहे हैं?हाल ही में ...
12/08/2026

तकनीक की जीत या संवेदनाओं की हार?
क्या हम आधुनिकता की अंधी दौड़ में अपने संस्कारों का अंतिम संस्कार कर रहे हैं?
हाल ही में सोनीपत की एक घटना ने समाज को झकझोर कर रख दिया, जहाँ एक पिता की अंतिम विदाई वीडियो कॉल पर हुई और ₹5,100 का ऑनलाइन भुगतान कर औपचारिकता पूरी कर ली गई। वहीं दूसरी ओर, लाखों फॉलोअर्स वाली एक इन्फ्लुएंसर की अंतिम यात्रा में गिने-चुने लोग ही पहुँचे।
यह दृश्य आज की उस कड़वी सच्चाई को बयां करते हैं, जहाँ हम डिजिटल रूप से दुनिया से तो जुड़े हैं, लेकिन अपने ही परिवार से दूर होते जा रहे हैं। सोशल मीडिया की लोकप्रियता वास्तविक जीवन के आत्मीय संबंधों का विकल्प नहीं हो सकती।
लेखक राजेश 'सार्थक' के अनुसार, आज 'कुटुम्ब प्रबोधन' की चीखती अनिवार्यता है। हमें तकनीक का विरोध नहीं करना है, बल्कि तकनीक और संस्कृति के बीच संतुलन बनाना है।
आइए, इस पर विचार करें कि हम अपनी अगली पीढ़ी को क्या विरासत में दे रहे हैं? केवल सफलता या संवेदना भी?
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#कुटुम्बप्रबोधन

9 अगस्त को मूल निवासी दिवस के पीछे का काला सच जानें। कैसे नरसंहार के इतिहास को उत्सव में बदल दिया गया और इसके पीछे क्या ...
06/08/2026

9 अगस्त को मूल निवासी दिवस के पीछे का काला सच जानें। कैसे नरसंहार के इतिहास को उत्सव में बदल दिया गया और इसके पीछे क्या है मिशनरियों का एजेंडा? विस्तार से पढ़ें।
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#पाञ्चजन्य

 #अनुच्छेद370 से 5 अगस्त 2019 तक: जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक यात्रा, राष्ट्र की सामूहिक आकांक्षाओं का जीवंत प्रतिबिंब ✍️ ...
05/08/2026

#अनुच्छेद370 से 5 अगस्त 2019 तक: जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक यात्रा, राष्ट्र की सामूहिक आकांक्षाओं का जीवंत प्रतिबिंब ✍️ कैलाश चन्द्र
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 #पुस्तक_विमोचन इन्दौर के लेखक श्री दुर्गेश कुमार साध की दो पुस्तकों ‘एकालाप’ एवं ‘हिन्दू समाज की चुनौतियाँ एवं लव जिहाद...
01/08/2026

#पुस्तक_विमोचन

इन्दौर के लेखक श्री दुर्गेश कुमार साध की दो पुस्तकों ‘एकालाप’ एवं ‘हिन्दू समाज की चुनौतियाँ एवं लव जिहाद’ का विमोचन श्री विनय दीक्षित (अखिल भारतीय सह-संयोजक प्रज्ञा प्रवाह), श्री डॉक्टर मुकेश मोढ़ (इंदौर विभाग संघचालक), श्री नितेश पुरोहित (निदेशक एसजीएसआईटीएस) एवं श्री आचार्य गौरव गुरुजी (त्रिनेत्र भैरव धाम, उज्जैन) के हाथों सम्पन्न हुआ।

‘एकालाप’ निबंध संग्रह के पुस्तक परिचय में खण्डवा पॉलीटेक्निक से पधारे श्री अनादि शुक्ल ने कहा कि कैसे लेखक ने अपनी शारीरिक व्याधि एवं पारिवारिक समस्याओं से जूझते हुए अपनी पीड़ा को सृजन में परिवर्तित किया। उन्होंने यह भी कहा कि इस कृति का प्रत्येक अध्याय केवल अक्षरों का समूह नहीं, बल्कि जीवन की व्यावहारिक अनुभूतियों और सनातन सत्यों के मंथन से निकला हुआ नवनीत है।

‘हिन्दू समाज की चुनौतियाँ एवं लव जिहाद’ के पुस्तक परिचय में उज्जैन के डॉक्टर उत्तम मीणा ने बताया कि आज किस प्रकार के हथकंडों को अपनाकर समाज की भोली-भाली युवतियों और महिलाओं को प्रेमजाल में फंसाया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि हर वर्ष भारत की लगभग ५.२५ लाख युवतियाँ लव जिहाद का शिकार हो रही हैं और उससे बचाव का उपाय केवल जागरण ही है, जो यह पुस्तक कर सकती है।

श्री विनय दीक्षित ने हिन्दू समाज की चुनौतियों के बारे में कहा कि वे हर काल में रही हैं और उनसे लड़ने के लिए समाज में जहाँ एक ओर सरदार उधम सिंह जैसे वीर योद्धा थे, वहीं तुलदीदास जी जैसे बौद्धिक योद्धा भी रहे हैं, जिन्होंने समाज को एक दिशा प्रदान की। समाज की यही दिशा देने का कार्य एक लेखक को होता है।

क्षमा एक अवसर है, विराम नहीं — पेरेंटिंग और सामाजिक निगरानी की ओर एक कदमजंतर मंतर पर हुई घटना पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मो...
01/08/2026

क्षमा एक अवसर है, विराम नहीं — पेरेंटिंग और सामाजिक निगरानी की ओर एक कदम
जंतर मंतर पर हुई घटना पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की प्रतिक्रिया ने देश को चौंकाया — पर एक भिन्न कारण से। जिन युवाओं ने सार्वजनिक मंच पर उनके और उनकी दिवंगत माता के विरुद्ध अशोभनीय भाषा का प्रयोग किया, उनके विरुद्ध चल रहे आपराधिक मामलों को वापस लेने की बात करते हुए प्रधानमंत्री जी ने कहा कि युवावस्था में गलतियाँ होती हैं, और यही उन्हें सुधारने का अवसर भी है। उन्होंने इसे दंड और अदालती कार्यवाही से नहीं, मार्गदर्शन से सुलझाने की बात कही, और स्वयं समाज से भी यही अपेक्षा रखी।
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