02/03/2026
जरा सोचिए आज अगर संजू सैमसन ना होते तो कप्तान साहब का क्या होता ?
जब कप्तान साहब खुद 16 गेंदों में सिर्फ 18 रन बनाकर पवेलियन लौट गए।
टीम को बीच मझधार में छोड़कर।
आज अगर टीम बची है,
तो किसी भाषण से नहीं,
किसी नाम से नहीं—
संजू सैमसन के बल्ले से बची है।
पूरा मैच दबाव में था,
पूरी टीम फेल हो चुकी थी,
और तब सैमसन ने अकेले दम पर मैच निकाल कर दिखा दिया
कि जिम्मेदारी क्या होती है।
और सबसे ज़्यादा दर्द तब होता है,
जब याद आता है वो इंटरव्यू—शायद आपने सुना भी होगा
जहाँ सैमसन का नाम आते ही हँसी उड़ाई गई।
“किसे बाहर करूँ?”
“अभिषेक को?”
“तिलक को?”
कहकर अपने ही साथी खिलाड़ी की बेइज़्ज़ती की गई।
भाई,
अगर मौका नहीं देना था तो
सम्मान से भी कहा जा सकता था—
“अभी टीम अच्छा खेल रही है,
ज़रूरत पड़ी तो सैमसन को मौका ज़रूर मिलेगा।”
मगर नहीं…
घमंड बोल रहा था।
आज जवाब मिल गया।
आज सैमसन ने जवाब दिया—
मुँह से नहीं,
बल्ले से।
घमंड ज़्यादा दिन नहीं चलता।
क्रिकेट में नाम नहीं,
नियत और ज़िम्मेदारी काम आती है।
आज का मैच यही सिखा गया—
जो बोलते हैं, वो नहीं…
जो लड़ते हैं, वही जिताते हैं।