01/02/2024
मुश्किल थी संभलना ही पड़ा घर के वास्ते
फिर घर से निकलना ही पड़ा घर के वास्ते
मजबूरियों का नाम हमने श़ौक रख दिया
हर श़ौक बदलना ही पड़ा घर के वास्ते
स्वयं श्रीवास्तव
इक जिस्म से जवानी ऐसे बिछड़ रही है
जैसे दुल्हन की मेहंदी बिस्तर पे झड़ रही है
हथियार डाले बैठा हारा हुआ ये लड़का
और वो हसीन लड़की दुनिया से लड़ रही है
अनंत गुप्ता
और क्या आख़िर तुझे ऐ ज़िंदगानी चाहिए
आरज़ू कल आग की थी आज पानी चाहिए
ये कहाँ की रीत है जागे कोई सोए कोई
रात सब की है तो सब को नींद आनी चाहिए
मदन मोहन दानिश
"अपनी दुख भरी ज़िंदगी सुनकर भी होंठों पर मुस्कान आ जाए
जब हर एक की कहानी ऐसे मशहूर कवियों की ज़ुबानी कही जाए"
चयनिका संघ और बसन्त प्रस्तुत करता है आपके सामने "महफ़िल" एक ऐसी शाम जिसमें आप कवियों और शायरों के द्वारा शायद अपनी यादों को फिर से जी लेंगे। इस शाम को महफ़िल में बदलने के लिए हम सब से जुड़ने आ रहें हैं मशहूर कवि स्वयं श्रीवास्तव, मदन मोहन दानिश और अनंत गुप्ता।
ऐसे मशहूर कवियों को सुनने के लिए आइयेगा ज़रूर।