24/02/2017
*!! रुद्राष्टकम् !!*
*नमामीशमीशान निर्वाणरूपं*
*विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् |*
*निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं*
*चिदाकाशमाकाशवासं भजेSहम् ||१||*
हे भगवन ईशान को मेरा प्रणाम ऐसे भगवान जो कि निर्वाण रूप हैं जो कि महान ॐ के दाता हैं जो सम्पूर्ण ब्रह्माण में व्यापत हैं जो अपने आपको धारण किये हुए हैं जिनके सामने गुण अवगुण का कोई महत्व नहीं, जिनका कोई विकल्प नहीं, जो निष्पक्ष हैं जिनका आकर आकाश के सामान हैं जिसे मापा नहीं जा सकता उनकी मैं उपासना करता हूँ |
*निराकारमोंकारमूलं तुरीयं*
*गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् |*
*करालं महाकालकालं कृपालं*
*गुणागारसंसारपारं नतोङहम् ||२||*
निराकार, ओंकार के मूल, तुरीय (तीनों गुणों से अतीत), वाणी, ज्ञान व इंद्रियों से परे, कैलासपति, विकराल, महाकाल के भी काल, कृपालु, गुणों के धाम, संसार के परे आप परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ।
*तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभीरं*
*मनोभूतकोटि प्रभाश्रीशरीरम् |*
*स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगंगा*
*लसदभालबालेन्दुकण्ठे भुजंगा ||३||*
जो हिमाचल समान गौरवर्ण व गम्भीर हैं, जिनके शरीर में करोड़ों कामदेवों की ज्योति एवं शोभा है,जिनके सर पर सुंदर नदी गंगा जी विराजमान हैं, जिनके ललाट पर द्वितीय का चंद्रमा और गले में सर्प सुशोभित है।
*चलत्कुण्डलं सुभ्रनेत्रं विशालं*
*प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् |*
*मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं*
*प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ||४||*
जिनके कानों में कुण्डल हिल रहे हैं, सुंदर भृकुटि व विशाल नेत्र हैं, जो प्रसन्नमुख, नीलकंठ व दयालु हैं, सिंहचर्म धारण किये व मुंडमाल पहने हैं, उनके सबके प्यारे, उन सब के नाथ श्री शंकर को मैं भजता हूँ।
*प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं*
*अखण्डम् अजं भानुकोटिप्रकाशम् |*
*त्रयः शूलनिर्मूलनं शूलपाणिं*
*भजेङहं भावानीपतिं भावगम्यम् ||५||*
प्रचण्ड (रुद्र रूप), श्रेष्ठ, तेजस्वी, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मा, करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाश वाले, तीनों प्रकार के शूलों (दु:खों) को निर्मूल करने वाले, हाथ में त्रिशूल धारण किये, प्रेम के द्वारा प्राप्त होने वाले भवानी के पति श्री शंकर को मैं भजता हूँ।
*कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी*
*सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी |*
*चिदानंद संदोह मोहापहारी*
*प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ||६||*
कलाओं से परे, कल्याणस्वरूप, कल्पका अन्त (प्रलय) करने वाले, सज्जनों को सदा आनन्द देने वाले, त्रिपुर के शत्रु सच्चिदानन्दघन, मोह को हरने वाले, मन को मथ डालने वाले कामदेव के शत्रु, हे प्रभो! प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये॥
*न यावद् उमानाथपादारविन्दं*
*भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् |*
*न तावत्सुखं शान्ति संतापनाशं*
*प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम् ||७||*
जब तक श्री उमापति शिव के चरण कमलों को लोग नहीं भजते, तब तक उन्हें न इस संसार में और न परलोक में सुख- शांति प्राप्त होती है और न उनकी परेशानियों का नाश होता है। अतः सबके ह्रदय में निवास करने वाले हे प्रभु! प्रसन्न होइए॥७॥
*न जानामि योगं जपं नैव पूजां*
*नतोSहं सदा सर्वदा शंभुतुभ्यम् |*
*जराजन्मदुःखौघतातप्यमानं*
*प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो ||८||*
मैं न तो योग जानता हूँ, न जप और न पूजा ही। हे शम्भो! मैं तो सदा-सर्वदा आपको ही नमस्कार करता हूँ। हे प्रभो! बुढ़ापा तथा जन्म (मृत्यु) के दुःख समूहों से जलते हुए मुझ दुःखी की दुःख से रक्षा कीजिए। हे ईश्वर! हे शम्भो! मैं आपको नमस्कार करता हूँ || ८ ||
*रुद्रष्टकमिदं प्रोक्तं*
*विपेण हरतुष्टये |*
*ये पठन्ति नरा भक्त्या*
*तेषां शम्भुः प्रसीदति ||9॥*
*( इति श्रीरुद्राष्टकं संपूर्णम् )*
भगवान रुद्र की स्तुति का यह अष्टक उन शङ्करजी की तुष्टि (प्रसन्नता) के लिए ब्राह्मण द्वारा कहा गया। जो मनुष्य इसे भक्तिपूर्वक पढते हैं, उन पर भगवान् शम्भु प्रसन्न होते हैं॥9॥
🌷🙏 सुप्रभातम् 🙏🌷