धार्मिक विचारों कविताओं संग्रह

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 #होलिका दहन फाल्गुन मास की  #पूर्णिमा को सूर्यास्त के बाद किया जाता है, पर उस समय भद्रा नहीं होनी चाहिए।  #भद्रा के समय...
01/03/2026

#होलिका दहन फाल्गुन मास की #पूर्णिमा को सूर्यास्त के बाद किया जाता है, पर उस समय भद्रा नहीं होनी चाहिए। #भद्रा के समय #होलिका दहन करना निषेध है। #इस वर्ष 2 #मार्च को 17:55 पर पूर्णिमा तिथि लगते ही भद्रा लगेगी जो अगले सूर्योदय पूर्व 05:27 तक रहेगी।

#इस वर्ष #फाल्गुन पूर्णिमा 3 मार्च को ग्रस्तोदित #चन्द्रग्रहण है। #निर्णयसिन्धु में कहा है कि #पूर्णिमा को ग्रहण हो तो उससे पूर्वरात्रि में जिस समय भद्रा न हो उसमें होली जलाए। अगर दूसरे दिन #ग्रस्तोदित चन्द्रग्रहण हो तो पिछले दिन भद्रारहित रात्रि के चौथे प्रहर में सूर्योदय से पहले या फिर रात्रि में भद्रा के पुच्छभाग में होली जलाए।
"तत्र #ग्रहणनिर्णयः।
अत्र चेच्चन्द्रग्रहण तदा ततोर्वानिशि भद्रावर्जं पौर्णमास्यां होलिकादीपनम्।
अथ #परेऽह्निग्रस्तोदयास्तदा पूर्वदिने भद्रावर्णं रात्रौ चतुर्थयामे विष्टिपुच्छे वा होलिका कार्या।” – निर्णयसिन्धु

#जयसिंह कल्पद्रुम में तो प्राचीन #परंपरानुसार... #भविष्योत्तरपुराण के प्रमाण से 'भद्रान्ते सूर्योदयात् पूर्वे' ही सर्वश्रेष्ठ माना है, 'यदा तु प्रदोषे पूर्वदिने भद्रा भवति परदिने चास्तात्पूर्वमेव पंचदशी समाप्यते तदा #सूर्योदयात्पूर्वं भद्रान्तं प्रतीक्ष्य होलिका दीपनीया।'
――――――――――――
◆ #अतः इस साल 2-3 मार्च की रात्रि में निम्न मुहूर्त में #होलिका दहन #शास्त्रसम्मत है...........
★ सर्वश्रेष्ठ तो #भद्रासमाप्ति पर सूर्योदय से पूर्व - 05:27 - 06:53.......
★ अन्यथा #भद्रापुच्छ - रात्रि में 01:28 - 02:34
――――――――――――
यहां स्पष्ट है कि किसी भी स्थिति में प्रदोष के समय #होलिकादहन इस वर्ष पूर्णतः शास्त्र विरुद्ध है। इसलिए 2 मार्च को #प्रदोषकाल में इस साल #होलिका दहन नहीं हो सकता है..........

#भद्रा में होलिकादहन कथमपि #शास्त्रसम्मत नहीं है #क्योंकि..........
भद्रायां द्वे न कर्तव्ये श्रावणी फाल्गुनी तथा।
#श्रावणी नृपति हन्ति ग्रामं दहति फाल्गुनी॥
#निर्णयसिन्धु........
श्रावणी और होलिकादन भद्रा होने पर न करे। भद्रा में श्रावणी से राजहानि तथा होलिकादहन से ग्रामदाह होता है।

भद्रायां दीपिता होली राष्ट्रभंगं करोति वै।
– पुराणसमुच्चय
भद्रा में होली दाह से राष्ट्रभंग होता है।

◆ 3 मार्च को भी प्रदोषकाल में होलिका दहन नहीं हो सकता क्योंकि 3 को प्रदोष में पूर्णिमा ही नहीं है और प्रतिपदा में होलिका दहन निषिद्ध है :-

नन्दायां नरकं घोरं भद्रायां देशनाशनम्।
दुर्भिक्षं च चतुर्दश्यां करोत्येव हुताशनः॥
–विद्याविनोद
प्रतिपदा में होलिकादाह से नरक, भद्रा में देशनाश, और चतुर्दशी में करने से दुर्भिक्ष होता है।

प्रतिपद्भूतभद्रासु यार्चिता होलिका दिवा।
संवत्सरं तु तद्राष्ट्रं पुरं दहति साद्भुतम्॥
– चन्द्रप्रकाश
प्रतिपदा, चतुर्दशी, भद्रा और दिन, इनमें होली जलाना सर्वथा त्याज्य है। कुयोगवश यदि जला दी जाए तो वहाँ के राज्य, नगर और मनुष्य अद्भुत उत्पातों से एक ही वर्ष में हीन हो जाते हैं। Vedic jyotish and yagya
Vedic Pandit Gopal Ji
✉️Maharishi [email protected]

भोजन करने का शास्त्रिय विधान वस्त्री के साथ भोजन करने का कोई प्रायश्चित नहीं ।================================● द्विज पै...
28/02/2026

भोजन करने का शास्त्रिय विधान व
स्त्री के साथ भोजन करने का कोई प्रायश्चित नहीं ।
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● द्विज पैर धोकर -- पूर्वाभिमुख होकर -- दोनों पैर या एक पैर पृथ्वी पर रखते हुए भोजन के लिए आसन पर बैठे ।
= आर्द्रपादस्तु भुञ्जीयात् प्राङ्मुखश्चासने शुचौ ।
पादाभ्याम् धरणीं स्पृष्टवा पादेनैकेन वा पुनः ।।

● एक वस्त्र पहनकर तथा सारे शरीर को कपडे से ढककर भी भोजन न करें -- उल्टी पत्तल पर भी भोजन करने का निषेध है ।

● भोजन करते समय दृष्टि इधर-उधर न डालें - दृष्टि भोजन पर रहे -- और अन्न को नमस्कार करें -- परोसे हुए अन्न की निन्दा न करें -- क्योंकि जिस अन्न की निन्दा की जाती है उस अन्न को राक्षस खाते हैं।

" जुगुप्सितं च यच्चान्नं राक्षसा एव भुञ्जते। "

● हाथ में जल लेकर उससे अन्न की प्रदक्षिणा कर आचमन करें -- फिर ' प्राणाय स्वाहा ' आदि मंत्रों से पाँच प्राणों को आहुति दें -- ( कारण कि भूख प्राणों को ही लगती है - प्राण वायुरूप हैं - जिससे उन प्राणों और उदरस्थ जठराग्नि में ही यहाँ अन्न का होम किया जाता है -- इससे अन्न के संग्रह - व पकाने आदि के पाप से निवृत्ति हो जाती है ) । और वायु और अग्नि का यजन हो जाता है।

' पञ्च प्राणाहुतीः कुर्यात् समन्त्रं तु पृथक् पृथक् ।

● इसके विपरित भोजन करने वाला मूर्ख ब्राह्मण अन्न के द्वारा असुर - प्रेत और राक्षसों को ही तृप्त करता है ।
= अतोऽन्यथा तु भुञ्जानो ब्राह्मणो ज्ञानदुर्बलः ।
तेनान्नेनासुरान् प्रेतान् राक्षसांस्तर्पयिष्यति ।।

● जो ग्रास मुँह में जाने की अपेक्षा बडा होने कारण एक बार में ना खाया जा सके - उसमें से बचा हुआ ग्रास अपना उच्छिष्ट कहा गया है ।

● ग्रास के बचे हुए तथा मुँह से निकले हुए अन्न को अखाद्य समझें और उसे खा लेने पर चान्द्रायण - व्रत का आचरण करें ।
= पिण्डावशिष्टमन्यच्च वक्त्रान्निस्सृतमेव च।
अभोज्यं तद् विजानीयाद् भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत्।।

● जो अपना झूठा खाता है तथा एक बार खाकर छोडे हुए भोजन को फिर ग्रहण करता है उसको चान्द्रायण -- कृच्छ्र -- अथवा प्राजापत्य - व्रत का आचरण करना चाहिए ।

■ जो पापी स्त्री के भोजन किये हुए पात्र में भोजन करता है -- स्त्री का झूठा खाता है तथा स्त्री के साथ एक पात्र में भोजन करता है वह मानो मदिरा पान करता है -- तत्वदर्शी मुनियों ने उस पाप से छूटने का कोई प्रायश्चित ही नहीं देखा है ।
= स्त्रीपात्रभुङ्नरः पापः स्त्रीणामुच्छिष्टभुक्तथा ।
तया सह च यो भुङ्क्ते स भुङ्क्ते मद्यमेव हि ।।
न तस्य निष्कृतिर्दृष्टा मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः।।

● यदि पानी पीते - पीते उसकी बूँद मुँह से निकल कर भोजन पर गिर पडे तो वह खाने योग्य नहीं रह जाता -- जो उसे खा लेता है -- उस पुरुष को चान्द्रायण व्रत का आचरण करना चाहिए ।

● जिस भोजन में बाल या कोई कीडा पडा हो -- जिसे मुँह से फूँककर ठंडा किया गया हो -- उसको अखाद्य समझना चाहिए -- ऐसे अन्न को भोजन कर लेने पर चान्द्रायण व्रत का आचरण करना चाहिए ।

● भोजन करने के स्थान से उठ जाने के बाद जिसे छू दिया गया हो -- जो पैर से छू गया हो या लाँघ दिया गया हो -- वह राक्षस का खाने योग्य अन्न है -- ऐसा समझकर उसका त्याग कर देना चाहिए ।

● यदि आचमन किये बिना ही भोजन करने वाला द्विज भोजन के आसन से उठ जाये तो उसे तुरंत स्नान करना चाहिए -- अन्यथा वह अपवित्र हो जाता है ।

[ महाभारत आश्वमेधिकपर्व के वैष्णवधर्मपर्व से ]
संकल्प राम राज्य चैनल से साभार

🙏 कुलदेवी प्रसन्नता हेतु अद्भुत उपाय 🙏जब कुलदेवी का नाम न पता हो तो करें यह साधना🙏 ॐ देव्यै नमः! जय माँ! दोस्तों, आज मैं...
27/02/2026

🙏 कुलदेवी प्रसन्नता हेतु अद्भुत उपाय 🙏

जब कुलदेवी का नाम न पता हो तो करें यह साधना

🙏 ॐ देव्यै नमः! जय माँ! दोस्तों, आज मैं आपको एक ऐसा अद्भुत और शक्तिशाली उपाय बताने जा रहा हूँ जो उन सभी के लिए है जिन्हें अपनी कुलदेवी के बारे में जानकारी नहीं है। बहुत से लोगों को अपनी कुलदेवी का नाम नहीं पता होता, पूजा का तरीका नहीं पता होता, और वे चाहते हैं कि किसी तरह उनकी कुलदेवी प्रसन्न हों और उनका मार्गदर्शन करें। यह साधना खास तौर पर उन्हीं के लिए है।

इस साधना में एक विशेष चौपाई का जाप किया जाता है - "देवि पूज्य पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होही सुखारे॥" इस चौपाई का भावार्थ है कि हे देवी! आपके चरण कमल पूजनीय हैं, देवता, मनुष्य और मुनि सभी आपके चरणों की पूजा कर सुखी होते हैं। यह चौपाई इतनी शक्तिशाली है कि इसके नियमित जाप से कुलदेवी अवश्य प्रसन्न होती हैं।

बहुत से लोगों को अपनी कुलदेवी के बारे में कोई जानकारी नहीं होती। नाम नहीं पता, गोत्र नहीं पता, पूजा का तरीका नहीं पता। ऐसे में कुलदेवी प्रसन्न नहीं हो पातीं और जीवन में बाधाएं आती हैं। यह साधना उसी समस्या का समाधान है। इस साधना को करने से कुलदेवी प्रसन्न होती हैं और स्वप्न या किसी अन्य माध्यम से अपना परिचय देती हैं। एक बार कुलदेवी का नाम पता चल जाए तो फिर उनकी विधिवत पूजा कर सकते हैं और जीवन की सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं।

इस साधना के अनेक लाभ हैं। कुलदेवी की कृपा से घर में सुख-शांति आती है, पितर दोष दूर होते हैं, वंश वृद्धि होती है, संतान सुख मिलता है, धन-समृद्धि आती है, और जीवन की सभी बाधाएं दूर होती हैं। कुलदेवी के प्रसन्न होने से पूरा कुल उन्नत होता है और परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है।

अब बात करते हैं पूरी साधना विधि की। यह साधना आपको 21 दिन करनी है। अगर 41 दिन कर सकें तो और भी बेहतर है। मंगलवार से इस साधना की शुरुआत करें। सुबह स्नान करके पीले वस्त्र पहनें और पीला आसन बिछाएं। पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। सबसे पहले राम दरबार की फोटो सामने रखें। हाथ में जल लेकर संकल्प करें - "हे कुलदेवी! मुझे आपका नाम नहीं पता, कृपया इस साधना को स्वीकार करें और मुझे अपना परिचय दें।" संकल्प के बाद जल को जमीन पर छोड़ दें।

अब इस चौपाई का 108 बार जाप करें - "देवि पूज्य पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होही सुखारे॥" 108 बार जाप करने के बाद एक बार बजरंग बाण का पाठ करें। बजरंग बाण के बाद हनुमान जी से प्रार्थना करें - "हे बजरंगबली! मुझे अपनी कुलदेवी का नाम नहीं पता, कृपया मुझे रास्ता दिखाएं।" अब माता सीता का एक माला (108 बार) जाप करें। माता सीता से प्रार्थना करें - "हे माता सीता! मुझे अपनी कुलदेवी की जानकारी नहीं है, आप कृपा करके मुझे स्वप्न में या किसी अन्य माध्यम से मेरी कुलदेवी का नाम बता दें।"

अब भगवान राम को मीठी चीज का भोग लगाएं। हनुमान जी को भी भोग लगाएं। अगर शिव मंदिर में यह साधना करें तो बेहद श्रेष्ठ है, वरना घर पर भी कर सकते हैं। यह साधना आपको तब तक निरंतर करनी है जब तक आपको संकेत नहीं मिल जाता। आपकी प्रारब्ध के अनुसार कम या ज्यादा समय लग सकता है, लेकिन आपको चिंता नहीं करनी है।

यह साधना इतनी शक्तिशाली है कि इससे आपको आपकी कुलदेवी का साक्षात्कार होने की प्रबल संभावना है। जब कुलदेवी प्रसन्न होती हैं, तो वे स्वप्न में आकर, किसी संत के माध्यम से, या किसी अन्य तरीके से अपना परिचय देती हैं। एक बार नाम पता चल जाने के बाद फिर उनकी विधिवत पूजा करें और उनका आशीर्वाद प्राप्त करें।

इस साधना को करने वाले अनेक भक्तों को चमत्कारिक अनुभव हुए हैं। किसी को स्वप्न में कुलदेवी ने दर्शन दिए, किसी को किसी संत ने नाम बता दिया, किसी को अचानक किसी पुराने दस्तावेज में नाम मिल गया। माँ की कृपा से सब कुछ संभव है।

तो दोस्तों, अगर आपको भी अपनी कुलदेवी के बारे में नहीं पता है, तो यह साधना जरूर करें। 21 दिन की इस साधना के बाद आप खुद महसूस करेंगे कि जीवन में सकारात्मकता आ गई, बाधाएं दूर हो गईं और कुलदेवी की कृपा बरसने लगी

🙏 जय माँ कुलदेवी! जय श्री राम! जय हनुमान! 🙏

🔥 अगले भाग में जानेंगे

✅ कुलदेवी मिलने के बाद क्या करें

✅ कुलदेवी की पूजा कैसे करें

✅ कुलदेवी से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण उपाय

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