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🙏🏻 ॐ नमः शिवाय  🙏🏻 We have taken the initiative to do the mantra of Bhairav Dada on Kala Ashtami.Today is an auspicious ...
08/06/2026

🙏🏻 ॐ नमः शिवाय 🙏🏻

We have taken the initiative to do the mantra of Bhairav Dada on Kala Ashtami.

Today is an auspicious day of Kala Ashtami tithi,

We invite everyone who is keen to participate in the mantra j*p anusthan,

Mantra will be,

"Aum Bhairavay Namah"

Thank you all,

Har Har Mahadev
🕉️
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नमो नमः उग्रभैरवाय। Namo namah Ugrabhairava भगवान शरभ। जिन्होंने भगवान नरसिंह का प्रकोप को शांत किए थे, कहीं कहीं पर प्र...
03/06/2026

नमो नमः उग्रभैरवाय।
Namo namah Ugrabhairava

भगवान शरभ। जिन्होंने भगवान नरसिंह का प्रकोप को शांत किए थे, कहीं कहीं पर प्रमाण मिलता है उन्होंने नरसिंह भगवान का वध ही कर दिए थे। इन्हीं शरभेश को साळुब, पक्षीराज, महाभैरव, आकाशभैरव, पक्षीभैरव, आशुगरुड़, बड़वाग्निभैरव, दुर्गेश(शुलिनीदुर्गा के पति), इत्यादि नामों से जाना जाता है। वैसे ही भगवान शरभेश के ही एक अन्य नाम और रूप है "उग्रभैरव" । जिस प्रकार भगवती कालिका दक्षिणाकाली, भद्रकाली, गुह्यकाली इत्यादि विविध भेदरूप वालीं होने पर भी भद्रकाली (64 प्रकार की भद्रकाली है) और गुह्यकाली( एक लाख प्रकार की गुह्यकाली है) अलग रूप से स्वतंत्र रूप से विद्यमान है, जैसे महाविद्या तारा के ही एक भेद नीलसरस्वती है तथापि नीलसरस्वती अपने आप में सातप्रकार की फिर 12 प्रकार की है, वैसे ही भगवान शरभ के एक एक भेदरूप होने पर भी उग्रभैरव अपने आप में एक स्वतंत्र विग्रह है, यद्यपि ये स्वयं शरभ ही है। भगवान के इस उग्रभैरव मूर्ति की कथा हमे शैवागम " #शरभमतसार" में प्राप्त होते हैं। जैसे विष्णुअवतार होते हुए भी भगवान नरसिंह का स्वतंत्र धाम "श्वेतद्वीप" है वैसे ही, भगवान सदाशिव के ही अवतार होने पर भी शरभेश का अपना अलग स्वतंत्र धाम है जो "स्वर्णद्वीप, स्वर्णकुट, स्वर्णाद्रि" आदि नामसे विख्यात है। यहां कथा के अनुसार होलिकापुत्र कुटिलाक्ष, अंधक, धूंधूमारी और वेताल इत्यादि चार असुरभ्राता अपने मामाके हत्यारे से प्रतिशोध लेने हेतु भगवान नरसिंह से युद्ध करने लगे, उस युद्ध में यह चारों असुरभ्राता अजेय थे, उन चारों के रक्त से करोड़ों असुर उत्पन्न हो रहे थे। कितना भी प्रयत्न करनेके बाद भी भगवान नरसिंह उन चारों को पराजित नहीं कर पा रहे थे तव भगवान ने अपने नारसिंही वैष्णवीमाया को स्मरण किए, तब विष्णुपत्नी नारसिंही अपने चार रूप में प्रकट हुई, तीक्ष्णभैरवी, दहनभैरवी, पिशाचभैरवी, वज्रभैरवी। इनके अपरनाम इस प्रकार है- महावागीश्वरी, चण्डरेवती, महामाया और भगमालिनी। चारों देवियों से १२ प्रकार के और योगिनी उत्पन्न हुए-

#महावागीश्वरी से- दुर्गा, भद्रकाली, वैष्णवी, शार्ङ्गिणी, अपरा, कृत्या, सुतीक्ष्णा, वज्रकामिशी, कामाख्या, नारायणी, त्रिपुरा और महाकाली।
#चण्डरेवती से- महालक्ष्मी, चण्डिका, सावित्री, ज्येष्ठा, मारिणी, अपराजिता, कपालिनी, अम्बिका, छिन्नमुण्डा, धूमावती, वाराही,माहेन्द्री।
#महामाया से- सरस्वती, जया, अजिता, कालदंष्ट्री, खेचरी, चण्डहासिनी, कौवेरी, उग्रा, महासंध्या, नीलसंध्या, तारा और एकजटी।
#भगमालिनी से- वक्रदंता, कोटराक्षी, चामुण्डा, विंध्यवासिनी, कालरात्रि, दारुणा, अपराजिता, अघोरा, महानित्या, सूर्पिणी, शीतला और कालसंकर्षिणी।

यह सब "नृसिंह-योगिनी" है, महाविष्णु की अहंताशक्ति महालक्ष्मी की सेविका तथा नरसिंह आवरण की क्षेत्रपालिका है। इन सभी शक्तियों का प्रादुर्भाव देखकर भगवान नरसिंह भी अपने देह से ४८ क्षेत्रपालक भैरवों को उत्पन्न किए। इन सभी ने मिलकर वह चारों दैत्य और उसके सेनाका भक्षण कर सर्वनाश कर दिए, लेकिन अत्यधिक तमोगुणकार्य करने पर सभी नृसिंहशक्ति और नृसिंह भैरव और भगवान नरसिंह स्वयं अपने संतुलन को खो दिए और जगत संसार में सभी को पीड़ित करने लगे, ऐसी अवस्था में भगवान ब्रह्मा आदिपुरुष शरभेश के शरण में जाने पर शरभने उग्रभैरव मूर्ति धारण कर नरसिंह को अपने पैरों तले दमन कर दिए और सभी नृसिंहभैरवों को अपने में विलीन कर दिए, लेकिन फिर तब उग्रभैरव के उग्रता और अतिशय अग्निज्वाला से जगतको ध्वंस होते देख सरस्वती देवी पराशांभवीमाया शरभशक्ति मनोन्मनी उग्रप्रत्यांगिरा कालिका के शरण में गयी, तब सरस्वती देवी की प्रार्थना से भगवती उग्रप्रत्यांगिरा भगवान उग्रभैरव के वामभाग में स्थित होकर भगवान के लिंग को मर्दन करती हुई उनके साथ मैथुन करने लगी तब वह शांत हुए। उस क्षण नरसिंह के समस्त पत्नी और नृसिंहशक्तियां स्वतः उग्रप्रत्यांगिरा कालिका के शरीर में विलीन हो गयी। इसी संदर्भ में #नंदिकेश्वर यहां नंदिनी देवी को कह रहे हैं-

तदा नारसिंही शक्तिः कालिकाङ्गे समागता।
रुद्रांशाः सकलाः पुंसः शक्तयः कालिकांशजाः॥
अंशिनी कालिका चांशभूताः ये शक्तयः खलु।
तया व्याप्तमिदं विश्वं माहेश्वर्या स्वमायया॥
मायायास्तस्या वै स्वामी रुद्रो देवः सनातनः।
यथेच्छं सृजते विश्वं संहरत्यपि लीलया॥

अर्थ - हे देवी तब भगवान नृसिंह की समस्त नारसिंही शक्तियां उग्रप्रत्यांगिरा कालिका के शरीर में समाहित हो गई; इस संसार के समस्त पुरुष परमेश्वर रुद्र के अंश हैं और समस्त शक्तियाँ कालिका के अंश से उत्पन्न हुई हैं, जहाँ निश्चित रूप से कालिका ही समस्त शक्तियों की स्वामिनी "अंशी" हैं और अन्य सभी शक्तियाँ उनके ही अंश से प्रकट हैं, उन माहेश्वरी माया ने ही अपनी दिव्य माया से इस संपूर्ण जगत को व्याप्त कर रखा है; और उस माहेश्वरी माया के स्वामी सनातन रुद्र परमात्मा हैं, जो अपनी इच्छानुसार इस ब्रह्मांड की रचना करते हैं और अपनी लीला मात्र से ही इसका संहार भी कर देते हैं।

नरसिंह भगवान शरभेश द्वारा दंडित होने पर शांतचित्त से प्रत्यंगिरा, शूलिनी और उग्रभैरव के स्तुति करते हैं। भगवान शरभ के जितने मूर्ति हैं उन सभी में यह भैरव अत्यधिक उग्र होने के कारण ही उग्रभैरव नाम से विदित है। भगवान उग्रभैरव के अनेक मंत्र है। पंचाक्षरी, दशाक्षरी, द्वादशाक्षरी, पंचविंशाक्षरी , शताक्षरी इत्यादि मंत्र है लेकिन पंचविंशाक्षरी मंत्र उनका मूलमंत्र है। उस ध्यान का अनुवाद इस प्रकार है -

भगवान शिव पार्वती जी से कहते हैं कि हे देवि! सब प्रकार के दुखों, कष्टों और उपद्रवों को नष्ट करने वाले इस परम दुर्लभ स्वरूप का ध्यान सुनो, जिसके केवल स्मरण और ध्यान मात्र से ही जीवन की बड़ी से बड़ी महा-आपत्तियां और घोर संकट तत्काल पलायन कर जाते हैं। वे उग्रभैरव महाश्मशान भूमि के ठीक मध्य में एक श्वेत कमल के आसन पर स्थित प्रज्वलित होती हुई लाश के उपर लेटे हुए भगवान नरसिंह के हृदय के ऊपर स्थित सियार (फेरु) की पीठ पर सवार होकर वे अत्यंत आनंदपूर्वक प्रलयंकारी सुख-ताण्डव नृत्य कर रहे हैं। साक्षात प्रज्वलित महा-अग्नि के समान देदीप्यमान देहकांति वाले इन भैरव का मुख श्येन (बाज पक्षी) और सिंह दोनों के अंगों से संयुक्त है । ज्वालामुखी के समान भयंकर रौद्र रूप वाले उनके सिर के भूरे-लाल (पिंगल) केश ऊपर की ओर उठे हुए हैं, सूर्य, चंद्रमा तथा अग्नि ही उनके तीन महानेत्र हैं और क्रोध के कारण उनकी भौंहें अत्यंत टेढ़ी दिखाई देती हैं। उनकी बाहर की तरफ निकले हुए विकराल दांत पूरी तरह से शत्रुओं के रक्त से सनी हुई हैं, वे दांत देखने में अत्यंत तीक्ष्ण, भीमकाय और परम भयानक हैं। उनके कानों में विशाल नागों के कुंडल सुशोभित हो रहे हैं और उन्होंने अपने शरीर पर हाथी की खाल (गजचर्म) का उत्तरीय ओढ़ा हुआ है। अत्यंत सुंदर कटी हुई मुंडों की माला को पहनने वाले वे भैरव अत्यंत भयंकर विषैले सर्पों का ही यज्ञोपवीत को अपने गले में धारण किए हैं। और अपनी कलाइयों में दिव्य नागों का कंगन धारण किए हुए हैं, और वे अपने महाविशाल स्वरूप में कुल बीस भुजाओं से संपन्न हैं। वे अपने दाहिने तरफ के दस हाथों में क्रमशः सुदर्शन चक्र, दिव्य त्रिशूल, महाघंटा, अचूक बाण, खोपड़ी, दर्पण, अक्षमाला, कटा हुआ नरमुंड, सियार का बच्चा (शिवापोत) और तीक्ष्ण तलवार (असि) धारण करते हैं; तथा अपने बाएं तरफ के दस हाथों में क्रमशः शंख, मुद्गर , अग्नि, धनुष , ढाल, यमपाश, अमोघपाशुपतास्त्र, गिद्ध पक्षी और खट्वांग धारण किए हुए हैं।(यहां पर सिर्फ 19 हाथों में स्थित अस्त्रों का वर्णन है संभवतः भगवान यहां पर देवी को आलिंगन किए हैं इसलिए उस हाथ का वर्णन नहीं है) वे पूर्णतः उपर की तरफ उठे हुए लिंग वाले और विरूपाक्ष हैं जो महाकाली के साथ नृत्य कर रहे हैं; उनके वाम (बाएं) भाग में साक्षात सिंह के मुख वाली उग्र 'महाकाली' प्रतिष्ठित हैं, जहाँ देवी ने अपने हाथ में भगवान के उपर उठे हुए लिंग को पकड़ी है और वे स्वयं अपने अन्य हाथों में शूल, ढाल तथा तलवार धारण कर परम सुशोभित हो रही हैं। भैरव अपने मस्तक पर सूर्य, चंद्ररेखा को धारण किए हैं। अपनी जटाओं में प्रवाहित होती गंगा जी की पावन धारा से परम सुशोभित होने वाले, अपने शरीर पर आठ महा-पंख धारण करने वाले तथा असीमित एवं अनंत पराक्रम से युक्त परम विग्रह स्वरूप उन 'उग्र' नामक भैरव का जीवन की समस्त बाधाओं, तंत्र-मंत्र अभिचारों और शत्रुओं से पूर्णतः मुक्त होने के लिए अनन्य भाव से ध्यान करना चाहिए।

यह भगवान उग्रभैरव के मूलतः दो ही पत्नी है, यथा उग्रप्रत्यांगिरा कालिका और भगवती शूलिनी दुर्गा। लेकिन उग्रभैरवमालामंत्र के अनुसार इनके तीनपत्नी है महालक्ष्मी, महाकाली और वाग्वादिनी। शरभमतसार के अनुसार कोल्हापुर महालक्ष्मी तथा प्राधानिक महाकाली और महासरस्वती ही इनके पत्नी है। अपितु यह कहना गलत नहीं होगा उग्रभैरवकल्प के अनुसार दशमहाविद्या के पति रूप में उग्रभैरव का वर्णन है, यह उग्रभैरव एक एक महाविद्या के साथ अलग-अलग रूप में स्थित हैं। मालामंत्र कहते हैं "सर्वविद्यास्वरूपाय महालक्ष्मीप्रियाय वाग्वादिनीपतये अघोराय महोग्राय..." । लेकिन यहां पर यह स्पष्ट कर दूं यह मत संपूर्ण रूप से शैवमत है। शाक्त मत इस मतको स्वीकार नहीं करते हैं। भगवान उग्रभैरव का समस्त मंत्र मूलतः शैव ग्रंथों में है, लेकिन सिर्फ कुछ मंत्र जैसे पंचाक्षरी और दशाक्षरी मंत्र शाक्तों में प्रचलित हैं। उग्रभैरव के संपूर्ण क्रमदीक्षा केवल और केवल शैव पाशुपत और वीरशैव पंरपरा में प्राप्त होते हैं। उग्रभैरव धूमावती, छिन्नमस्ता, विपरीत-महाप्रत्यंगिरा, कुब्जिका, विश्वलक्ष्मी, निर्वाणषोडशी तथा गुह्यकाली के अंगदेवता मात्र रूप से शाक्तों में दृष्टिगोचर होते हैं। भगवान उग्रभैरव अतिशय उग्र भयंकर देवता हैं। शैवों में #पूर्वकौल होने पर ही कोई इनके मंत्र प्राप्त कर पता है प्राथमिक स्तर में इनका कोई भी मंत्र किसी को नहीं दिया जाता है। अभिचार क्रिया हो अथवा विद्यासिद्धि सबमें भगवान उग्रभैरव का मंत्र सर्वोत्तम है। शरभमतसार अनुसार पातालनरसिंह के सिद्धि प्राप्त करने पर ही इनके शताक्षरी मंत्र में अधिकार प्राप्त होता है। और परमआश्चर्य की बात यह है नृसिंहकल्प और गंडभेरुण्डकल्प अनुसार भगवान अघोरमहावीर गण्डभेरुण्डमहानृसिंह ने शरभदेव को वध कर दिए थे लेकिन यहां वही गण्डभेरुण्डमहानृसिंह भगवान उग्रभैरव के पचाश अक्षरों बाले मंत्र के मंत्रद्रष्टा ऋषि है। गण्डभेरुण्डमहानृसिंह के मंत्र सिद्धि के बाद इस मंत्र का अधिकार प्राप्त होता है। यही उग्रभैरवकल्प में भगवान गण्डभेरुण्डमहानृसिंह उग्रभैरव भगवान के महाऽनड्वाह वाहन बनते हैं। इन भैरव के विषय में अधिक कुछ चर्चा करना अधिकार बहिर्भूत होगा, कुछ व्यक्तियों के अनुरोध करने पर ही हमने इस विषय में सम्यक प्रकाश डाला है... भारत के कतिपय स्थान में इनके अति प्राचीन मंदिर हैं, केरल के त्रिशूर, कर्णाटक हाम्पि, तथा नेपाल काठमांडू में उनके कुछ अतिप्राचीन मंदिर है। उग्रभैरव के साथ यदा-कदा उग्रचण्डा देवी को भी जोड़ा जाता है। किन्हीं कारणों से महामुनि अगस्त्य से देवी उग्रप्रत्यांगिरा कालिका को श्राप प्राप्त होता है की वह शिवभक्त महिषासुर का वध कर शिवद्रोही बन जाएंगी। यही कारण हो सकता है की उग्रचण्डा देवी उग्रप्रत्यांगिरा कालिका के ही स्वरुप है....(शैवमत)

Aum Ardhnareshwaray Namah . . . . .
26/05/2026

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ॐ शं शनैश्चराय नमः 🙏May Shani Dev shower health, prosperity, discipline, and positivity upon all.Heartfelt Shani Jayanti...
16/05/2026

ॐ शं शनैश्चराय नमः 🙏
May Shani Dev shower health, prosperity, discipline, and positivity upon all.
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गिरनार का एक अद्भुत दृश्य : जब नव नाथ , भगवान दत्तात्रेय ओर शिवजी मिलके आध्यात्मिक चर्चा कर रहे हो . . . . .
11/05/2026

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🙏🏻 ॐ नमः शिवाय  🙏🏻 We have taken the initiative to do the mantra of Bhairav Dada on Kala Ashtami.Today is an auspicious ...
10/04/2026

🙏🏻 ॐ नमः शिवाय 🙏🏻

We have taken the initiative to do the mantra of Bhairav Dada on Kala Ashtami.

Today is an auspicious day of Kala Ashtami tithi,

We invite everyone who is keen to participate in the mantra j*p anusthan,

Mantra will be,

"Aum Bhairavay Namah"

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